शिक्षण के सूत्र [Maxims of Teaching]

शिक्षण के सूत्र (Maxims of Teaching in hindi)

• शिक्षण सूत्र क्या है ?
एक सफल शिक्षक के लिए विषय का ज्ञाता होने के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि वह अपने ज्ञान को बालकों तक इस प्रकार संप्रेषित कर पाए कि सभी तरह के विद्यार्थी इससे लाभांवित हो सके। शिक्षण कार्य में अध्यापक को बहुत सी व्यवहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
 उदाहरण के तौर पर शिक्षण का प्रारंभ कहां से किया जाए ? कौन सी विषय वस्तु पहले पढ़ाई जाए ? कौन सी बाद में ? विषय वस्तु को दैनिक जीवन के अनुभवों से कैसे जोड़ा जाए ? अमूर्त तथ्यों का ज्ञान कैसे दिया जाए ?  विषयों का आपसी संबंध कैसे स्थापित किया जाए ? शिक्षण को रुचिकर व सरल कैसे बनाया जाए ?
 इन सब प्रश्नों का हल ढूंढने के लिए विषय वस्तु का क्रम इस प्रकार निर्धारित करना होता है कि विद्यार्थी विषय वस्तु को सही ढंग से ग्रहण कर सकें। इस प्रकार की सभी कठिनाइयों से निपटने के लिए और शिक्षण कार्य की सफलता सुनिश्चित करने के लिए शिक्षण सूत्रों (Teaching Maxim's) का निर्धारण किया जाता है।
 महान शिक्षाशास्त्रियों ने अपने अनुभव तथा विचारों को सूत्र रूप में प्रकट किया है। उनका अनुसरण करके शिक्षण को सरल एवं प्रभावी बनाया जा सकता है। शिक्षण सूत्रों का जनक हरबर्ट स्पेंसर को माना जाता है।
शिक्षण सूत्र, Teaching Maxims in hindi
शिक्षण सूत्र Teaching Maxims

शिक्षण सूत्र का अर्थ

शिक्षण सूत्र विशिष्ट शिक्षा सिद्धांतों पर आधारित न होकर सामान्य ज्ञान और अनुभव के आधार पर बनाए गए हैं।
शिक्षण सूत्र की उपयोगिता अनुभव द्वारा सिद्ध हो चुकी है। यह अध्यापक को विषय वस्तु की मात्रा क्रम व्यवस्था हेतु दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं। शिक्षक सूत्रों के प्रयोग द्वारा अपने शिक्षण को क्रमबद्ध व्यवस्थित और रोचक बना सकता है।
अगर बात की जाए की शिक्षण सूत्र कितने है तो इनकी संख्या निश्चित नहीं है। शिक्षा मनोविज्ञान ने बहुत से शिक्षण सूत्र बताए हैं। शिक्षण सूत्र के प्रतिपादक या जनक कोई एक शिक्षा मनोवैज्ञानिक न होकर बहुत सारे मनोवैज्ञानिक है। शिक्षण में प्रयुक्त किए जाने वाले प्रमुख शिक्षण सूत्र निम्नांकित हैं-
1. सरल से कठीन की और
2. ज्ञात से अज्ञात की और
3. संपूर्ण से अंश की और
4. स्थूल से सूक्ष्म की और
5. प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की और
6. विशिष्ट से सामान्य की और
7. अनुभव से तर्क की और
8. विश्लेषण से संश्लेषण की और
9. मनोवैज्ञानिक क्रम से तार्किक क्रम की और
10. अनिश्चय से निश्चितता की और

1. सरल से कठिन की ओर
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि बालक किसी सरल बात को समझने के पश्चात ही जटिल बात समझ सकता है। इसलिए सरल तथ्यों को पहले पढ़ाया जाना चाहिए और क्रमानुसार जटिल को बाद में बताया जाना चाहिए। यदि प्रारंभ में ही जटिल तथ्य बताये जाएंगे तो बालक हताश हो जाएगा और शिक्षण में रूचि नहीं लेगा। पाठ की शुरुआत सरल प्रश्नों से की जाती है और धीरे-धीरे क्रमिक ढंग से सरल से कठिन की ओर अग्रसर किया जाता है।
 यहां यह तथ्य ध्यान देने का है कि सरलता और जटिलता को अध्यापक अपनी दृष्टि से ना देख कर बालक की दृष्टि से देखें तभी इस सूत्र का सही अनुसरण कर सकता है।
उदाहरण -१.भाषा में वाक्य निर्माण सिखाते समय सरल व छोटे वाक्य पहले और फिर जटिल तथा लंबे वाक्यों को सिखाना चाहिए।
२. गणित में गुणनफल सिखाते समय एक अंक वाली फिर दो या तीन अंक वाली राशि का गुणनफल सिखाना चाहिए।
३. रसायन विज्ञान में इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पढ़ाते समय कम परमाणु क्रमांक वाले परमाणुओं का विन्यास पहले और फिर जटिल परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास दिखाना चाहिए।

2. ज्ञात से अज्ञात की ओर
 इस सूत्र का महत्व बताते हुए स्पेंसर ने लिखा है -"मस्तिष्क को जानी हुई बात पसंद होती है और उस पसंद का उन बातों तक जिनका उस से संबंध स्थापित किया जा सकता है, स्वयं ही विस्तार हो जाता है।
व्यक्ति अपने पूर्व ज्ञान को आधार बनाकर नए ज्ञान को सीखता है। नवीन प्रत्यय को ग्रहण करने से पहले उसे अपने पूर्व अनुभवों की कसौटी पर कसता है।
 अतः शिक्षक को किसी प्रकरण को पढ़ाने से पहले इस बात का पता लगा लेना चाहिए कि बालक का उस प्रकरण के संबंध में पूर्वज्ञान (Pre Knowledge) कितना है। शिक्षक को इस पूर्व ज्ञान को ही नये ज्ञान का आधार बनाकर शिक्षण प्रारंभ करना चाहिए। जिससे बालक के लिए नवीन ज्ञान को ग्रहण करना आसान हो जाएगा। अध्यापक अपने प्रति दिन का पाठ वहां से प्रारंभ करें जहां विद्यार्थी पहले से ही थे और फिर धीरे धीरे जटिलताओं की ओर अग्रसर हो । ऐसा करने से छात्रों का ध्यान शिक्षण की ओर केंद्रित हो जाएगा और वह शिक्षण में रूचि लेंगे।
 उदाहरण -१. बालकों को संचार के साधन पढ़ाने के लिए प्रारंभ में उनसे उन साधनों के बारे में प्रश्न पूछे जाएं जिनका वह किसी भी रुप में पूर्व मे अनुभव कर चुके हैं।
२. विज्ञान में मिश्रण का पृथक्करण पढ़ाने के लिए शुरू में बालकों से दैनिक जीवन में सामान्यतः प्रयोग किए जाने वाले मिश्रण के उदाहरण और उन्हें पृथक करने के तरीके के बारे में प्रश्न करें।

3. संपूर्ण से अंश की ओर

 शिक्षण का आयोजन संपूर्ण से अंश की ओर किया जाना चाहिए। बालक को प्रारंभ में संपूर्णता और बाद में अंशों का ज्ञान दिया जाना चाहिए।
यह सूत्र मनोविज्ञान के गेस्टाल्टवाद (Gestalt Theory) पर आधारित है। जिसके अनुसार व्यक्ति सर्वप्रथम किसी पूर्ण वस्तु,स्थिति आदि का प्रत्यक्षीकरण करता है और फिर अंशो की ओर ध्यान देता है। पहले संपूर्ण वस्तु का चित्र मस्तिष्क पर अंकित होता है और फिर वह संपूर्ण के परिप्रेक्ष्य में अंशो को समझता है। ऐसा करने से बालक उसका संपूर्ण से संबंध स्थापित कर पाएगा और उसके मस्तिष्क में प्रत्येक अंश की स्थिति, उसका प्रयोग, उसका महत्व आदि भी साथ साथ स्पष्ट होते जाएंगे।
आरंभिक पठन शिक्षण में 'संपूर्ण से अंश की ओर' शिक्षण सूत्र का प्रयोग किया जाता है।
 उदाहरण -
१.रुधिर परिसंचरण तंत्र का चित्र दिखाकर फिर उसके प्रत्येक भाग ह्रदय, आलिंद, निलय,धमनी, शिरा आदि का अध्ययन करना चाहिए।क्योंकि ये अपने आप में अलग नहीं हैं, संपूर्ण परिसंचरण तंत्र के अंश हैं।
२.जैसलमेर जिले में जलवायु धरातल आदि पढ़ाने से पहले यह बताया जाना चाहिए कि जैसलमेर राजस्थान प्रांत में स्थित है। राजस्थान की स्थिति का भारत के मानचित्र (Map) में अवलोकन करने का अवसर दिया जाए फिर राजस्थान के मानचित्र में जैसलमेर कहां स्थित है, दर्शाया जाना चाहिए तभी छात्र जैसलमेर का भूगोल भली-भांति समझ सकेगा।

4. स्थूल से सूक्ष्म की ओर
 शिक्षण का आयोजन स्थूल वस्तुओं से सूक्ष्म विचारों की ओर किया जाना चाहिए। प्रारंभ में बालक स्थूल वस्तुओं को देखकर समझता है। सूक्ष्म एवं अमूर्त विचारों को समझने की शक्ति उसमें आयु के साथ धीरे-धीरे आती है।
 स्थूल से अभिप्राय उन वस्तुओं से है जिनका हम ज्ञान इंद्रियों से अनुभव कर सकते हैं ।देखकर, छूकर हम उन्हें महसूस कर सकते हैं।
सूक्ष्म का अर्थ ऐसे अमूर्त विचारों,मूल्यों,सिद्धांतों से है जिन्हें कल्पना करके अनुभव द्वारा समझा जा सकता है। शिक्षण में अध्यापक द्वारा चार्ट,मॉडल, चित्र का प्रयोग करके सूक्ष्म तत्वों को स्पष्ट करना इसी सूत्र का अनुसरण है। इनको देखकर विद्यार्थी में शनैः शनैः सूक्ष्म रूप से विचार करने की योग्यता का विकास होता है।
'स्थूल से सूक्ष्म की ओर' शिक्षण सूत्र को अन्य नाम 'मूर्त से अमूर्त की ओर' तथा 'प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर' से जाना जाता है। यह सूत्र आगमन विधि पर लागू है।
जबकि सामान्य से विशिष्ट की ओर तथा सूक्ष्म से स्थूल की ओर शिक्षण सूत्र निगमन विधि पर लागू है।
आगमन विधि के शिक्षण सूत्र - विशिष्ट से सामान्य की ओर तथा स्थूल से सूक्ष्म की ओर (मूर्त से अमूर्त की ओर)।
निगमन विधि के शिक्षण सूत्र - सामान्य से विशिष्ट की ओर तथा सूक्ष्म से स्थूल की ओर (अमूर्त से मूर्त की ओर)।

 उदाहरण -
१.विद्यार्थियों को 'एकता में बल है' इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए एक लकड़ी को तोड़ना और लकड़ियों का बंडल तोड़ने का ठोस उदाहरण प्रस्तुत करने से यह समझ सकेंगे कि एकजुट होकर रहने से शक्ति बढ़ती है।

२.गणित के जोड़ घटाव सिखाने के लिए अबेकस (Abecas) या कांच या मिट्टी की गोलियों का प्रयोग करना। इससे छात्र धीरे-धीरे मानसिक स्तर पर यह क्रिया करने लगते हैं।

5. प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर

प्रत्यक्ष सदा ही अप्रत्यक्ष को जानने और समझने में सहायता देता है। इसलिए अध्यापक को शिक्षण में पहले इन उदाहरणों,वस्तुओं,घटनाओं का प्रयोग करना चाहिए जो बालक के आसपास के प्राकृतिक पर्यावरण में उपस्थित हो। अन्यथा बातों की व्याख्या और स्पष्टीकरण करना कठिन होगा जो अप्रत्यक्ष हैं।
 सामाजिक अध्ययन, भूगोल, और विज्ञान आदि विषयों में इस सूत्र का भलीभांति उपयोग किया जा सकता है। अध्यापक विद्यालय के पास के पर्यावरण में विद्यमान पहाड़ियों, नदी, नालों, बांधों आदि का प्रत्यक्ष अवलोकन करवा कर उन के आधार पर हिमालय पर्वत, नील नदी और भाखड़ा बांध आदि के बारे में शिक्षण करवाता है तो यह क्रिया प्रत्यक्ष व परोक्ष की ओर बढ़ना कहलाती है। प्रभावी शिक्षण के लिए प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की और सूत्र को ध्यान में रखकर शिक्षण आयोजित करना चाहिए।

 उदाहरण -
१.आस पास पाए जाने वाले रेगिस्तानी पौधे जैसे- नागफनी, बबूल आदि अनुकूलन के निरीक्षण के आधार पर पर्वतीय क्षेत्रों के पौधों के अनुकूलन को समझाना चाहिए।
२. स्थानीय पर्यावरण में रहने वाले पक्षियों, जीव जंतुओं के अवलोकन और निरीक्षण के आधार पर दूरस्थ क्षेत्रों के जीव जंतुओं, पक्षियों की विशेषताओं का शिक्षण करवाना।
३. स्थानीय संस्थाओं जैसे पंचायत, Bank, न्यायालय आदि की कार्यप्रणाली को दिखाकर उच्चतम न्यायालय, विश्व बैंक (world bank) आदि की कार्यप्रणाली को समझाना।

6. विशिष्ट से सामान्य की ओर
विशिष्ट उदाहरणों के आधार पर सामान्य तत्व का बोध कराना इस सूत्र का उद्देश्य है।अर्थात छात्र को विशिष्ट उदाहरणों से समान्यीकरण की ओर अग्रसर किया जाता है। विद्यार्थी के समक्ष विशिष्ट उदाहरण प्रस्तुत किए जाते हैं। छात्र इनका अवलोकन करके स्वयं निष्कर्ष निकलता है। उदाहरणों में उपस्थित समानता का अध्ययन, अवलोकन और परीक्षण करके नियमितीकरण करता है।
 इससे छात्र को ऐसा प्रतीत होता है कि वह खुद ज्ञान की खोज कर रहा है और उसमें आत्मविश्वास उत्पन्न होता है। इससे ज्ञान स्थाई और स्पष्ट होता है। शिक्षण का यह सूत्र आगमन विधि पर आधारित है।

 उदाहरण -
१. 'वाष्पीकरण के परिणामस्वरुप ठंडक पैदा होती है' इस सामान्य नियम को समझाने के लिए स्प्रिट को हाथ पर लगाने पर ठंडक का अनुभव होना, घड़े से पानी के वाष्पीकरण से सिर्फ पानी का ठंडा होना, पसीना सूखने पर ठंडक का अनुभव होना आदि। विशिष्ट उदाहरणों के प्रस्तुतीकरण से छात्र स्वयं यह सामान्यीकरण करता है कि वाष्पीकरण से ठंडक पैदा होती है।

२.संज्ञा को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न स्थानों, वस्तुओं, व्यक्तियों के नामों के उदाहरण जैसे- अजमेर, जयपुर, आम, गीता, राजेंद्र आदि उदाहरणों के द्वारा विद्यार्थियों से ही संज्ञा की परिभाषा निकलवाना।

7.अनुभव से तर्क की और
प्रारंभ में बालक के ज्ञान का एक बड़ा भाग बालक के अनुभव पर आधारित होता है। वह अपने परिवार में आसपास के वातावरण से खेलकूद के समय विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त करता है परंतु यह ज्ञान तर्क पर आधारित नहीं होता।
 इस सूत्र का अभिप्राय बालक के इस अनुभव किए ज्ञान को युक्तिसंगत एवं तर्कयुक्त करने से है। इस सूत्र का प्रयोग लगभग सभी  विषयों के शिक्षण को बच्चों के लिए आसान और रुचिकर बनाने में किया जा सकता है। किंतु अध्यापक को यह जानना जरूरी है कि उसके विषय अथवा प्रकरण से संबंधित कौन से अनुभव विद्यार्थी दैनिक जीवन में प्राप्त कर चुके हैं।
उदाहरण -
१. जैसे रात्रि में आकाश में तारे दिखाई देते हैं, दिन में गायब हो जाते हैं।
२. सर्दियों में दिन छोटे और गर्मियों में बड़े होते हैं।
३.सर्दियों में सुबह घास पर ओस की बूंदें दिखाई देती है।
 इस अनुभव किए गए तथ्यों को आधार बनाकर उनके कारणों को शिक्षण द्वारा तर्क के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास करना चाहिए।

8. विश्लेषण से संश्लेषण की ओर

 विश्लेषण वह प्रक्रिया है जिसमें पहले समस्या का संपूर्ण रूप में अनुभव किया जाता है और इसके पश्चात विश्लेषण द्वारा इसके विभिन्न पहलुओं,तत्वों पर विचार किया जाता है और अंत में संश्लेषण से समस्या का समाधान प्रस्तुत किया जाता है।
 यह किसी भी समस्या को हल करने की स्वाभाविक मानसिक प्रक्रिया है। केवल विश्लेषण करने से ज्ञान को स्पष्ट नहीं किया जा सकता इसके लिए विश्लेषण के पश्चात संश्लेषण प्रणाली को अपनाना भी आवश्यक है।
 यह सूत्र 'संपूर्ण से अंश की ओर' शिक्षण सूत्र का विरोधी नहीं है क्योंकि पहले प्रारंभ में संपूर्ण समस्या को अनुभव करना आवश्यक है इसके बाद ही उसका विश्लेषण किया जा सकता है।

 उदाहरण-

१. विज्ञान में किसी यौगिक का उसके अवयवी तत्व में विश्लेषण द्वारा उनकी प्रतिशत मात्रा और रासायनिक बंधों का अध्ययन और इसके बाद निर्धारित नियमों के आधार पर यौगीक की संरचना का निर्माण करना।

२. शिक्षण के विभिन्न विशिष्ट कौशलों का अलग-अलग अध्ययन और अभ्यास करवाना और इसके बाद सभी कौशलों को समन्वित करके प्रभावी शिक्षण करना,विश्लेषण से संश्लेषण की ओर बढ़ने की ही प्रक्रिया है।

9. मनोवैज्ञानिक क्रम से तार्किक क्रम की ओर

इस शिक्षण सूत्र के द्वारा विद्यार्थी को शिक्षण में सीखने के लिए तत्पर किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक क्रम बालकों की रुचियों, रुझानों, जिज्ञासा, ग्रहण शक्ति तथा आवश्यकता से संबंधित है। तार्किक क्रम का संबंध पाठ्यवस्तु को तर्कात्मक ढंग से विभिन्न भागों में बांटकर एक क्रमबंद,व्यवस्थित रुप में बालकों के समक्ष प्रस्तुत करने से है।
शिक्षण के प्रारंभ में मनोवैज्ञानिक क्रम अपनाने से विद्यार्थी का सीखने के प्रति रुझान बढ़ जाता है और वह उस चीज को सीखने की आवश्यकता अनुभव करने लगता है। ऐसा हो जाने पर शिक्षक के लिए अब विषय वस्तु का विस्तृत और गहन ज्ञान प्रदान करने हेतु तार्किक क्रम को अपनाना उपयुक्त होता है ।

उदाहरण -
१.विज्ञान विषय में विद्यार्थियों को ओजोन छिद्र के कारण तथा प्रभाव का अध्ययन कराना है। इसके लिए यदि प्रारंभ में उन्हें वायुमंडल की आवश्यकता, इसका हमारे जीवन में महत्व, इसकी प्रत्येक परत की उपयोगिता संबंधी जानकारी देने से वायुमंडल की परतों का सरंक्षण, ओजोन प्रदूषण के कारण आदि को जानने में बालक अधिक रुचि लेंगे।

२.नागरिक शास्त्र में अधिकारों की अनभिज्ञता से व्यक्ति को क्या-क्या नुकसान हैं, इनकी जानकारी ना होने पर दूसरे लोग उसका शोषण कर सकते हैं। यह ज्ञान होने पर वह मूल अधिकार क्या है,संविधान में इसके लिए क्या प्रावधान है ? इसको जानने के लिए अधिक तत्पर हो जाएगा।

10. अनिश्चिय से निश्चितता कि और
 बालक ज्ञान ग्रहण करने की प्रक्रिया में प्रारंभ में अनिश्चितता की स्थिति में होता है। धीरे-धीरे तथ्यों को एकत्रित करके तर्क के आधार पर उन्हें व्यवस्थित करके निश्चित रूप से किसी ठोस समाधान पर पहुंचता है।

 उदाहरण -
१.बालक के समक्ष विज्ञान में कोई समस्या, जैसे -उबला हुआ अंडा पानी में क्यों डूब जाता है ?रखने पर बालक विभिन्न परिकल्पनाएं इसके हल के लिए बनाता है यह अनिश्चितता की स्थिति है। फिर प्रयोग परिक्षण द्वारा अध्यापक सही निर्णय पर निश्चयात्मकता की ओर ले जाता है।