अधिगम अंतरण के सिद्धांत Theories Of Transfer Learning

अधिगम अंतरण के सिद्धांत Transfer Of Learning theory

1. समरूप तत्व सिद्धांत

अधिगम स्थानांतरण का यह सिद्धांत इस तथ्य पर आधारित है कि जब दो कार्यों, विषयों, अनुभवों अथवा क्रियाओं में समानता होती है तो उसी प्रकार की समान परिस्थिति में प्राप्त ज्ञान अधिक सहायक होता है।
थॉर्नडाइक (Thorndike) के मतानुसार, "समरूप तत्वों का एक स्थिति से दूसरी स्थिति में संक्रमण होता है।" अनेक प्रयोगों के आधार पर थॉर्नडाइक ने इस तथ्य की पुष्टि की है कि दो कार्यों में जितनी अधिक समानता होगी उतना ही अधिक वे एक दूसरे के कार्यों में सहायक होंगे। जैसे संस्कृत का ज्ञान हिंदी के अध्ययन में सहायक होता है।
 क्रो एवं क्रो (crow & crow) ने स्पष्ट करते हुए कहा है, "समान तत्व अथवा समरूप तत्व सिद्धांत के अनुसार एक स्थिति से दूसरी स्थिति की ओर अंतरण उसी अनुपात में होता है, जिसमें दोनों स्थितियों की विषय- सामग्री, दृष्टिकोण, विधि अथवा उद्देश्यों के तत्वों में समानता रहती है।"
सोरेन्सन (Sorenson) ने भी इसी रूप में माना है, "समरूप तत्व सिद्धांत के अनुसार एक परिस्थिति से दूसरी परिस्थिति में उस सीमा तक अंतरण हो जाता है जब तक कि दोनों ही समान होते हैं।"
अधिगम अंतरण के सिद्धांत, अधिगम स्थानांतरण में शिक्षक की भूमिका
Transfer of learning theory

2. सामान्यीकरण का सिद्धांत

सामान्यीकरण के मत का प्रतिपादन जुड jud ने किया था। जुड के मतानुसार, "जब एक छात्र विज्ञान के किसी विषय के सामान्य सिद्धांत को भली-भांति समझ जाता है तब उसमें अपने प्रशिक्षण की दूसरी स्थितियों में अंतरण करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है।"
सामान्यीकरण के सिद्धांत का अभिप्राय है:-- "जिस सीमा तक कोई व्यक्ति अपने अनुभव के माध्यम से कोई सामान्य सिद्धांत निकाल लेता है, उसी सीमा तक संस्कारों का अंतरण होता है।" तथा जब तक किसी क्रिया या विषय के सामान्य सिद्धांतों का अवबोध नहीं  होता उस समय तक अंतरण संभव नहीं होता।
 अर्थात् कोई व्यक्ति सीखने में मिले अनुभव, ज्ञान और आदतों का सामान्यीकरण करके उन्हें दूसरे प्रकार की सीखने की नवीन परिस्थितियों में लागू करता है।
उदाहरणार्थ -- यदि कोई शिक्षक बाल मनोविज्ञान का ज्ञाता है तो वह उस ज्ञान का उपयोग कक्षा कक्ष के समय छोटे बालकों की समस्याओं के हल करने में कर सकता है।


अधिगम अंतरण के सिद्धांत, Transfer Of Learning theory
Adhigam antran ke sidhant

3. दो तत्व सिद्धांत Two Factors Theory

 दो तत्व सिद्धांत के प्रतिपादक स्पीयरमैन (spearmen) है। स्पीयरमैन ने बुद्धि का अध्ययन करके निष्कर्ष निकाला कि बुद्धि के दो प्रकार हैं (१) सामान्य बुद्धि G तथा (२) विशिष्ट बुद्धि S ।
सामान्यत: व्यक्ति जीवन में सामान्य बुद्धि अथवा सामान्य योग्यता का प्रयोग करता है। विशिष्ट बुद्धि अथवा विशेष योग्यता प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न होती है। सामान्य बुद्धि ही अंतरण का आधार होती है। इसी आधार पर जब बालक गणित अथवा साहित्य आदि का अध्ययन करता है तो उसकी सामान्य योग्यता का ही अंतरण होता है। विशिष्ट योग्यता का अंतरण नहीं होता है।

4. पूर्ण-आकार वाद सिद्धांत (Gestalt Theory)

इस मत के समर्थक पूर्ण-आकार वादी कोहलर मनोवैज्ञानिक है जो ज्ञान या क्रिया के आकार को महत्व देते हैं। सूझ अथवा अंतर्दृष्टि को ये लोग महत्वपूर्ण मानते हैं।
कोहलर ने चिंपाजी व चूहों आदि पर अनेक प्रयोग अधिगम से संबंधित किए और पाया कि अंतर्दृष्टि से अनुभव का एक परिस्थिति से दूसरी परिस्थिति में अंतर होता है। इसमें प्रशिक्षण देते समय परिस्थिति के प्रति सूझ रखना आवश्यक है।
 अनेक मनोवैज्ञानिकों ने इस विचार को समरूपता तत्वों के आधार पर विकसित हुआ माना है किंतु यह थार्नडाइक के समरूप तत्व की तुलना में संकीर्णता लिए हुए व सीमित है।

5.मूल्यों के अभिज्ञान का सिद्धांत

बागले (bagle) ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। बागले का मत है, "सामान्यीकरण ही संपूर्ण कहानी नहीं है, अपितु इसका संवहन भावात्मक पहलू के साथ आदर्श के द्वारा होना चाहिए। यदि अंतरण किया जाता है तो गुण विवेचन होना ही चाहिए।
 वास्तव में बागले के मत का आधार आदर्श है जिसका तात्पर्य है किसी क्रिया को संपादन करते समय विद्यार्थियों में आदर्श का विकास होना आवश्यक है। यह सिद्धांत तार्किकता, परिशुद्धता और स्वच्छता जैसे आदर्श और पारंपरिक मूल्यों पर बल देता है।

• अधिगम अंतरण के शिक्षक के लिए निहितार्थ /उपादेयता

 विद्यालय में छात्र अपने अध्यापक के सानिध्य में रहकर अपने ज्ञान की वृद्धि करते हैं, उनसे मूल्य व आदर्श सीखते हैं जिससे वह आगे चलकर देश के उपयोगी नागरिक बन सके। अध्यापक छात्रों को जो कुछ सिखाता है उसकी छात्रों के व्यवहार में अनुपालना होनी आवश्यक है तभी शिक्षा का उद्देश्य पूर्ण होगा।
वास्तव में अध्यापक शैक्षिक सिद्धांतों को कक्षा कक्ष में सिखाकर उनका भावी जीवन में अंतरण करना भी सिखाता है। इस दृष्टि से अध्यापक की भूमिका छात्रों के अधिगम अंतरण में सशक्त मानी जा सकती है।
 अधिगम स्थानांतरण में शिक्षक की भूमिका को निम्नानुसार स्पष्ट किया जा सकता है :-
1. अधिगम अंतरण के लिए महत्वपूर्ण है की अध्यापक कक्षा में ज्ञान के प्रयोग हेतु अधिकाधिक परिस्थितियां प्रदान करें। समस्या समाधान पर विशेष बल दिया जाए। समस्याएं भी वास्तविकता से संबंध हो, काल्पनिक न हो जिनका संबंध बालकों के व्यवहारिक जीवन से न हो।
2. अधिगम अंतरण के लिए आवश्यक है कि शिक्षक बालकों में समझदारी के गुणों का विकास करें। यह गुण अंतरण को अत्यधिक प्रभावित करता है। अध्यापक का दायित्व है कि वह कक्षा में छात्रों को अनेक उदाहरण देकर किसी विकास के नियम या उसकी अवधारणा को स्पष्ट करें जिससे छात्रों के अवबोध का दृढ़ीकरण हो और इस आधार पर अधिगम अंतरण भी व्यवस्थित होगा।
3. अध्यापक का दायित्व है कि वह छात्रों को पाठ्य विषय में आने वाले तथ्यों को अन्य विषयों के संदर्भ में समानता के आधार पर खोजने के लिए प्रेरित करें जिससे एक विषय का अंतरण दूसरे विषयों में हो सकेगा।
4.अध्यापक अध्ययन की सर्वोत्तम विधियों का उपयोग करके छात्रों को विभिन्न विधियों से अवगत करा सकता है जो अधिगम अंतरण को भी प्रभावित करेगा। यथा -- वाद-विवाद, समस्या समाधान अथवा प्रश्न विधि आदि का अंतरण अन्य क्षेत्रों में भी हो सकेगा।
5. अधिगम अंतरण (transfer of learning) की अध्यापक के लिए उपादेयता इस संदर्भ में भी है कि वह कक्षा कक्ष में जिन मूल्यों आदर्शों को छात्रों को प्राप्त कराना चाहता है वे भावी जीवन में भी बालक के अंग बन जाए। जिसके लिए योजना बनानी चाहिए।
6. अध्यापक कक्षा में बालकों को पढ़ाते समय वास्तविक कार्य के साथ उचित उदाहरण देकर अधिगम अंतरण करें यथा -- गणित अथवा जयामिति की पाठ्य सामग्री का भविष्य में अंतरण आसानी से हो जाता है। अतः अनेक उदाहरणों के आधार पर छात्रों के अवबोध को दृढ़ किया जा सकता है तथा भविष्य में परिस्थिति आने पर उनका अनुप्रयोग किया जा सकता है।
7.अध्यापक का यह भी दायित्व है कि वह इस बात के लिए निश्चित रहे की सामान्य सिद्धांत छात्रों द्वारा ह्रदयंगम कर लिए गए हैं या नहीं। अधिगम अंतरण के लिए कक्षा कक्ष परिस्थितियों का जीवन की परिस्थितियों में अंतरण आवश्यक है।
8. अध्यापक को इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि उसके समक्ष समस्या यह है कि छात्रों को कैसे सिखाए कि वह एक स्थिति से प्राप्त अनुभवों का अपने व्यवहारिक जीवन में उपयोग कर सकें। इसके लिए बालकों को दो समान अथवा विभिन्न परिस्थितियों में अपने शैक्षिक अनुभवों को अंतरण करना सीखना चाहिए। अध्यापक को यह भी देखना चाहिए कि वह अपने अधिगमों को समान अथवा इन परिस्थितियों में कैसे अंतरित करते हैं।
9. तीव्र बुद्धि वाले छात्र अपने सीखें गए ज्ञान अन्य परिस्थितियों में सुगमता से अंतरण कर लेते हैं। अतः अध्यापक की भूमिका इस रूप में महत्वपूर्ण है कि वह ऐसे छात्रों पर विशेष ध्यान दें।
 अंततः यह कहा जा सकता है कि अधिगम अंतरण में शिक्षक की महत्वपूर्ण उपादेयता व भूमिका है। अतः उसे एक कार्य की मुख्य विशेषताओं को पहचान कर उसका अंतरण अन्य परिस्थितियों में कराना चाहिए। छात्रों की मानसिक योग्यता एवं व्यक्तिगत विभिन्नता के प्रति अध्यापक को जागरुक रहना आवश्यक है क्योंकि सकारात्मक और प्रभावी अधिगम अंतरण (effective transfer of learning) का यह सशक्त कारक है।
 शिक्षक को अपने छात्रों को नियमित रूप से इस बात का प्रशिक्षण देते रहना चाहिए कि वह एक विषय व स्थिति में सिखे गए ज्ञान का अन्य परिस्थितियों में अंतरण कर सके।


 फ्रेंडसन ने उचित ही कहा है, "अंतरण अधिगम की कुशलता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालने वाला व्यापक कारक है।" शिक्षक इसमें अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। यही शिक्षक के लिए निहितार्थ है।