असहयोग आंदोलन : शुरुआत, कारण और परिणाम क्या रहे

असहयोग आंदोलन : शुरुआत कब हुई, क्या कारण रहे, समापन कैसे हुआ और क्या परिणाम रहे. Non Co-operation Movement in hindi.

असहयोग आंदोलन प्रथम जन आंदोलन था क्योंकि गांधीजी ने भारत में अनेक प्रकार के अहिंसक आंदोलनों का संचालन किया। 1920 से 1947 तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन (Indian National Movement) का इतिहास गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलनों का इतिहास है। इसी के अंतर्गत सन 1920 से 22 तक असहयोग आंदोलन (non cooperation movement) का संचालन किया। यह आंदोलन भारत के पहले व्यापक जनांदोलन के रूप में गांधी जी के नेतृत्व में चला।

असहयोग आंदोलन की शुरुआत कब हुई

गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन (Khilaphat Movement) का समर्थन किया और हिंदू मुसलमानों की एकता को असहयोग आंदोलन का आधार बनाने का निश्चय किया तथा 1920 के कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव रखा जिसे स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार 1920 में असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई। सरकार जनता के सहयोग के आधार पर चलती है अतः इस सहयोग को समाप्त करके सरकार के आधार को समाप्त करना इसका लक्ष्य था।

असहयोग आंदोलन : शुरुआत कब हुई और कारण और परिणाम क्या रहे, non cooperation movement in hindi
Non Co-operation Movement

असहयोग आंदोलन के क्या कारण हैं

1. मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों से असंतोष
 प्रथम महायुद्ध के दौरान भारतीयों ने तन, मन और धन से अंग्रेजी को अंग्रेजों की सहायता की थी। अंग्रेजों ने भी भारतीयों की इस सहायता की प्रशंसा की तथा अंग्रेज यह भी घोषणा कर रहे थे कि युद्ध "विश्व में प्रजातंत्र को सुरक्षित रखने के लिए लड़ा जा रहा था।" राष्ट्रपति विल्सन ने अपने 14 सिद्धांतों में आत्म निर्णय के सिद्धांत की बात कही थी और यह आशा जागृत की की युद्ध के बाद उनके देश में स्वशासन संस्थाओं की स्थापना की जाएगी। लेकिन जो सुधार योजनाएं जुलाई, 1918 में प्रकाशित की गई उनसे भारतीय न केवल असंतुष्ट हुए बल्कि निराश भी हुये। मोंटेग्यू सुधार योजना के संबंध में एनीबेसेंट का विचार था कि "ऐसे सुधारों का देना इंग्लैंड के अनुदार दृष्टिकोण का सूचक था और इनका स्वीकार करना भारत के लिए अपमानजनक था।" मांटेग्यू सुधार कांग्रेस व मुस्लिम लीग के प्रस्तावों से भी बहुत दूर थे। इसलिए तिलक ने इसे असंतोषजनक नहीं वरन निराशाजनक भी कहा।
2. रौलट एक्ट 1919
युद्ध के संकट का सामना करने के लिए जो अस्थाई विशेषाधिकार ब्रिटिश नौकरशाही को दिए गए थे वह युद्ध के बाद भी उन्हें छोड़ना नहीं चाहती थी अपितु क्रांतिकारियों का सफाया करने के लिए तथा सामान्य रूप से भय उत्पन्न करने के लिए उन्हें पास रखना चाहती थी। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए जस्टिस सिडनी रौलट समिति (1918) की सिफारिशों के आधार पर केंद्रीय व्यवस्थापिका में 2 विधेयक प्रस्तुत किए जो रौलट विधायकों के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें मुख्य बात यह थी कि फौजदारी कानून में ऐसे स्थाई परिवर्तन करने का सुझाव था जिसे राजनीतिक आंदोलनों को सरलता से दबाया जा सकता था। विधानमंडल में गैर सरकारी सदस्यों ने एकमत से इन विधायकों का विरोध किया। किंतु सरकारी बहुमत के कारण इनमें से एक विधेयक पास हो गया। जब संवैधानिक प्रतिरोध बेअसर रहा तो गांधी जी ने सत्याग्रह शुरू करने का सुझाव दिया। उनकी अध्यक्षता में फरवरी 1919 में एक सत्याग्रह सभा गठित की गई। 6 अप्रैल को जनता से हड़ताल की अपील की गई। जनता ने इस अपील पर बड़े उत्साह से अमल किया। तारीख के बारे में कुछ गलतफहमी के कारण दिल्ली में 30 मार्च को हड़ताल आयोजित कर ली गई जिसके दौरान काफी हिंसा फैली। लेकिन पंजाब की घटनाएं खतरनाक मोड़ ले रही थी।
महात्मा गांधी को असहयोग आंदोलन चलाने के लिए इसी एक्ट ने प्रेरित किया। 3 वर्ष के लिए रौलट एक्ट मार्च 1919 में स्वीकृत हुआ था। इस एक्ट के द्वारा सरकार राजनीतिक आंदोलन तथा राज्य के विरुद्ध किसी भी कार्य का दमन कर सकती थी। तथापि बिना मुकदमा चलाए किसी भी व्यक्ति को बंदी बना सकती थी। इस एक्ट ने महात्मा गांधी को ब्रिटिश सरकार का घोर विरोधी बना दिया था।
3. जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919)
रौलट एक्ट के विरोध के दौरान देश के अन्य राज्यों की भांति पंजाब में भी 6 अप्रैल 1919 को हड़ताल हुई।
पंजाब में माइकल ओ डायर का दमनकारी शासन, उसके द्वारा सेना में भारतीयों को भर्ती करने के लिए अपनाए गए अत्याचारी तरीके तथा जबरदस्ती वसूल किए गए युद्ध सहायता धन और नेताओं पर ढाए गए अत्याचार पंजाब में हुए उपद्रव तथा दंगों के लिए उत्तरदायी थे। डायर ने पंजाब में मार्शल लॉ लागू कर दिया तथा दंगों का दमन करने के लिए सेना की सहायता ली। इसी संबंध में 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग का अमानुषिक हत्याकांड हुआ। जनरल डायर ने बिना चेतावनी दिए निहत्थे आदमियों, स्त्रियों और बच्चों पर उस समय तक गोली चलाई जब तक बारूद समाप्त नहीं हो गया। यह सारा कांड इतनी निर्दयता से किया गया कि डायर ने घायलों को बाग में तड़पने को छोड़ दिया। जनरल डायर ने यह सारा कांड जानबूझकर आंतक और भय पैदा करने के लिए किया। इस कांड ने ऐसे असंतोष को जन्म दिया जो असहयोग आंदोलन के रूप में प्रकट हुआ।
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने सरकार की बर्बर तथा नृशंस नीति की कठोर आलोचना करते हुए सर (knighthood) की उपाधि का परित्याग कर दिया। गुरुदेव की उपाधि त्याग के साथ ही साथ सर शंकरन नायर ने पंजाब की घटनाओं के विरोध में वायरसराय की कार्यकारिणी परिषद से त्यागपत्र दे दिया। अंतत: सरकार ने लॉर्ड हंटर (Lord Hunter) की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की। पंडित जगत नारायण व सर चिमनलाल दो भारतीय सदस्य भी थे। लेकिन समिति ने अपनी रिपोर्ट में लीपापोती ही की।
4. खिलाफत के प्रश्न पर मुसलमानों में असंतोष
तुर्की के खलीफा ने प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन के खिलाफ जर्मनी का पक्ष लिया था। जिससे भारतीय मुसलमानों को भय था कि युद्ध के बाद जीतने पर अंग्रेज तुर्की से अवश्य बदला लेंगे। लेकिन युद्ध काल में भारतीय मुसलमानों से पूर्ण सहायता लेने के उद्देश्य से इंग्लैंड के प्रधानमंत्री ने यह घोषित किया कि युद्ध के उपरांत ब्रिटिश सरकार तुर्की के खिलाफ प्रतिशोध की नीति नहीं अपनाएगी। युद्ध में जर्मनी व तुर्की की हार हुई और तुर्की साम्राज्य के प्रदेशों को मित्र राष्ट्रों ने आपस में बांटकर छिन्न-भिन्न कर दिया जिससे भारतीय मुसलमानों में असंतोष व्याप्त हो गया जो खिलाफत आंदोलन का प्रमुख कारण बना।
मुसलमानों के खलीफा, तुर्की के सुल्तान के प्रति ब्रिटिश सरकार की क्रूर नीति से भारतीय मुसलमान न केवल असंतुष्ट थे बल्कि उत्तेजित भी हो रहे थे। उन्होंने अपने आपको खिलाफत सम्मेलन में संगठित किया। 24 नवंबर 1919 को दिल्ली में हिंदू मुसलमानों की एक सभा आयोजित की गई। इस सभा के लिए महात्मा गांधी को अध्यक्षता करने के लिए निमंत्रित किया गया। यह पहला अवसर था कि मुस्लिम सभा के लिए एक हिंदू को अध्यक्ष पद के लिए निमंत्रित किया गया था। गांधी जी ने जो पहले से हिंदू मुस्लिम एकता के पक्के समर्थक थे, इस अवसर को हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए उपयुक्त अवसर समझा
उपर्युक्त राजनीतिक कारणों के अतिरिक्त अन्य भी आंदोलन के कारण रहे जिसमें प्राकृतिक कारण - 1917 का अकाल, इनफ्लुएंजा और प्लेग की महामारी फैलना। युद्ध जन्य कारणों में प्रथम विश्व युद्ध के लिए धन व सेना एकत्रित करने की नीति और युद्ध का प्रभाव। आर्थिक और दोषपूर्ण प्रशासनिक कार्य प्रणाली आदि रहे हैं।

असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम

सितंबर 1920 के कोलकाता अधिवेशन तथा दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने ऐसे योग का जो प्रस्ताव पास किया था उसमें ऐसे योग आंदोलन के कार्यक्रम की घोषणा की गई जिसमें सरकारी पदों व उपाधियों का त्याग सरकारी स्कूलों व कॉलेजों चुनावों सरकारी अदालतों का विदेशी माल का बहिष्कार किया गांधी जी ने केसर ए हिंद (kesar a hind) की उपाधि वापस कर दी अनेक वकीलों ने वकालत छोड़ दी विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार में महिलाओं ने बढ़ चढ़कर भाग लिया जनता ने इसमें निर्भीकता से भाग लिया।
आंदोलन के दो प्रमुख पक्ष थे सकारात्मक या रचनात्मक तथा नकारात्मक या विध्वंसात्मक।
रचनात्मक कार्यक्रम के अंतर्गत राष्ट्रीय स्कूलों व कॉलेजों की स्थापना, निजी पंचायतों का गठन, स्वदेशी का प्रचार, चरखा व हाथकरघा को प्रोत्साहन तथा अस्पृश्यता का अंत आदि के माध्यम से एक और सामाजिक विषमता का अंत करने का प्रयास किया गया तो दूसरी और राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से राष्ट्रीय हित के अनुकूल शिक्षा प्रदान करने का प्रयास किया गया। स्वदेशी और हाथ करघे द्वारा गरीबी और बेरोजगारी से लड़ने के साथ-साथ भारत की अर्थव्यवस्था को विदेशी चुंगल से मुक्त करने का प्रयास किया गया।
नकारात्मक या विध्वंसात्मक कार्यक्रम के अंतर्गत सरकारी पदों तथा उपाधियों का त्याग, सरकारी स्कूलों तथा कॉलेजों का बहिष्कार, चुनाव का बहिष्कार, सरकारी अदालतों का बहिष्कार, विदेशी माल का बहिष्कार आदि थे।

असहयोग आंदोलन के विरुद्ध कांग्रेस के नेता

सुरेंद्रनाथ, सी आर दास, विपिन चंद्र पाल, मदन मोहन मालवीय तथा मोहम्मद अली जिन्ना आदि। ये सभी नेता उदारवादी थे। एनीबेसेंट जिसका कांग्रेस पर विशेष प्रभाव था वह भी असहयोग आंदोलन (non cooperation movement) के सिद्धांत से सहमत नहीं थी।

चौरी-चौरा कांड तथा असहयोग आंदोलन का समापन

5 फरवरी 1922 को गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) के चौरी-चोरा (chouri-chora) नामक स्थान पर खिलाफत कमेटी (Khilaphat committe) तथा कांग्रेसजनों द्वारा एक जुलूस निकाला जा रहा था। जिसमें शामिल कुछ लोगों ने वहां तैनात पुलिसकर्मियों के दुर्व्यवहार से क्रुद्ध होकर पुलिस पर पथराव कर दिया। पुलिस ने गोलियां चलाई तथा विद्रोहियों ने थाने को जला दिया। जब गांधी जी को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने अनुभव किया कि अब असहयोग आंदोलन हिंसात्मक होता जा रहा है इसलिए उन्होंने आंदोलन को स्थगित कर देना उचित समझा। बारदोली में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में आंदोलन पर विचार किया गया। विचार-विमर्श के बाद स्थगन प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार 12 फरवरी 1922 को असहयोग आंदोलन राष्ट्रीय संघर्ष के लिए बहुत सारे नवीन आयाम बनकर समाप्त हो गया। 10 मार्च 1922 को गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया तथा राजद्रोह के आरोप में मुकदमा चलाकर उन्हें 6 वर्ष कैद की सजा दी गई।

असहयोग आंदोलन के परिणाम

1. जनता में चेतना तथा निर्भीकता का संचार
 इस आंदोलन ने जनता को निर्भीक बना दिया। जनता शासन द्वारा दी जाने वाली सजा को और यातनाओं को भुगतने के लिए पूरी तरह निडर हो गई।
2. राष्ट्रीय आंदोलन को जन आंदोलन में परिवर्तित करना
 असहयोग के माध्यम से गांधी जी ने राष्ट्रीय आंदोलन (national movement) को जन आंदोलन में परिवर्तन कर दिया। राष्ट्रीय आंदोलन अब केवल उच्च वर्ग तक ही सीमित नहीं रहा यह गांव गांव तक पहुंच गया। असहयोग आंदोलन (non cooperation movement) पहला आंदोलन था जिसने भारतीय जनता को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया।
3. आंदोलन के परिणामों को स्थायित्व प्रदान करना
 आंदोलन के दौरान रचनात्मक कार्य राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं का संचालन, विदेशी के स्थान पर स्वदेशी, चरखा, हाथ करघा आदि से देश को विशेष लाभ हुआ। इसे आंदोलन के परिणामों को स्थायित्व प्रदान किया।
4. सामाजिक विषमता तथा गरीबी और बेरोजगारी को दूर करने का प्रयत्न
 आंदोलन के रचनात्मक कार्यक्रम के माध्यम से एक और सामाजिक विषमता का अंत हुआ तो दूसरी और राष्ट्रीय हित के अनुकूलन शिक्षा प्रदान करने का प्रयास किया गया। स्वदेशी के माध्यम से गरीबी और बेरोजगारी से लड़ने के साथ साथ भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का प्रयास किया गया।