राजा राममोहन राय - जीवन परिचय

भारतवर्ष में राजा राममोहन राय को 'आधुनिकता का प्रवर्तक', 'नवजागरण का जनक', 'नवीन भारत का निर्माता' और 'मानवता का मित्र' माना जाता है।
 राजा राममोहन राय उस महान वैचारिक क्रांति के स्रष्टा थे जिससे आधुनिक भारत का जन्म हुआ है। वह महान दार्शनिक, धर्म सुधारक, समाज सुधारक, बहुभाषाविद, देशप्रेमी, मानवतावादी, परंपरा विरोधी तथा दूरदर्शी विद्वान थे
राजा राममोहन राय का जीवन परिचय
राजा राममोहन राय का जीवन परिचय

 राजा राममोहन राय का दृष्टिकोण बुद्धिवादी था। उन्होंने भारतीयता और पाश्चात्यता के समन्वय का रास्ता दिखाया। उन्होंने भारत में अंग्रेजी शिक्षा और आधुनिक शिक्षा का समर्थन किया। ब्रह्म समाज की स्थापना कर नवीन चेतना का एक शंखनाद किया।
 सर्वप्रथम राजा राममोहन राय ने सती प्रथा विरोधी कानून बनाने का प्रयास किया और भारत को आधुनिक युग में ले जाने का प्रयत्न किया। इसलिए उन्हें 'आधुनिक भारत का अग्रदूत' कहते हैं।
 राजा राममोहन राय आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचारक, समाज सुधारक और ब्रह्म समाज के संस्थापक के रूप में विख्यात है। उन्हें भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत माना जाता है। कवि रविंद्रनाथ टैगोर ने उन्हें 'आधुनिक भारत का सूत्रधार' कहा है।
राजा राममोहन राय मध्ययुगीन विश्वासों और उनसे जुड़ी हुई कुरीतियों पर प्रहार करके भारत को आधुनिकता की राह दिखाई। उन्होंने भारतीयता का कभी परित्याग नहीं किया किंतु वे भारतीय समाज की बुराइयों और कुरीतियों का उन्मूलन चाहते थे।
 राजा राममोहन राय फ्रांसीसी क्रांति के स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्श से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने साहसपूर्वक हिंदू कट्टरपंथी सीमा तोड़ने का प्रयास किया और स्वतंत्रता का बीज बोया जिसने पुष्पित और पल्लवित होकर राष्ट्र के नव जीवन को नई चेतना से अनुप्राणित किया।

राजा राममोहन राय का जन्म

Birth of Raja Rammohan Roy
राम मोहन का जन्म 22 मई 1772 ई. को बंगाल के ब्राह्मण परिवार में राधानगर (हूगली) गाँव में हुआ।

राजा राममोहन राय का विवाह

Marriage of Raja Rammohan Roy
राजा राममोहन राय का विवाह बाल्यावस्था में ही 9 वर्ष की आयु में ही कर दिया गया। उनकी पत्नी का जल्द ही निधन हो गया। इसके बाद 10 वर्ष की आयु में उनका दूसरा विवाह किया गया जिससे उनके दो पुत्र हुए। लेकिन 1826 में उस पत्नी का भी निधन हो गया और इसके बाद उसका तीसरा विवाह किया गया। लेकिन तीसरी पत्नी भी ज्यादा समय जीवित नहीं रह सकी। इस प्रकार राजा राममोहन राय के तीन विवाह हुए थे।

राजा राममोहन राय के माता-पिता का नाम

Name of parents Raja Rammohan Roy
पिता का नाम रामकंतो रॉय और माता का नाम तैरिनी था।

राजा राममोहन राय की शिक्षा-दीक्षा/नौकरी पेशा (कैरियर)

Raja Rammohun Roy education / job profession (career)
राजा राममोहन राय ने प्रारम्भिक शिक्षा संस्कृत और बंगाली भाषा में गाँव के स्कूल से ही हुई। बाद में उन्हें उच्च शिक्षा के लिए पटना के मदरसे में भेजा गया जहाँ उन्होंने अरेबिक और पर्शियन भाषा सीखी। उन्होने 22 की आयु में अंग्रेजी भाषा सीख ली थी। संस्कृत की शिक्षा के लिए वे काशी गए, जहाँ उन्होंने वेदों और उपनिषदों का अध्ययन किया।
उन्होंने अपने जीवन में बाइबिल के साथ कुरान और अन्य इस्लामिक ग्रन्थों का अध्ययन भी किया। राजा राममोहन राय ने जैन विद्वानों से जैन धर्म का गहराई से अध्ययन किया और मुस्लिम विद्वानों की मदद से सूफीवाद की शिक्षा ग्रहण की।
राजा राममोहन राय हिन्दू पूजा और परम्पराओं के विरुद्ध थे। वे सभी प्रकार की सामाजिक धर्मांधता और अंधविश्वास के विरुद्ध थे, परंतु उनके पिता हिन्दू रूढ़िवादी, पारम्परिक और कट्टर वैष्णव ब्राह्मण धर्म का पालन करने वाले थे। इस कारण पिता और पुत्र में मतभेद उत्पन्न हो गया और राजा राममोहन राय घर छोड़कर हिमालय और तिब्बत की तरफ चले गए। उन्होंने घर लौटने से पहल देश विदेश की काफी यात्राएं कीं। घर लौटने के बाद उनके विचारों में परिवर्तन लाने के लिए उनका विवाह कर दिया गया। लेकन विवाह और वैवाहिक जिम्मेदारियों ने उन पर कोई असर नहीं डाला।
इसके बाद वे वाराणसी गए और वहां उन्होंने वेदों, उपनिषदों एवं हिन्दू दर्शन का गहन अध्ययन किया। इसके बाद वे मुर्शिदाबाद लौट आए।
 राजा राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी के राजस्व विभाग में नौकरी शुरू की। वे 1805 में ईस्ट इंडिया कंपनी के एक पदाधिकारी जॉन डिग्बी के सहायक के रूप में काम करना शुरू किया। वहां वे पश्चिमी संस्कृति एवं साहित्य के संपर्क में आए। 1809 से लेकर 1814 तक उन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी के राजस्व विभाग में काम किया।

राजा राममोहन राय की मृत्यु

Death of Raja Rammohan Roy
नवंबर 1830 में राजा राममोहन राय अपनी पेंशन और भत्ते के लिए मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के राजदूत बनकर यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) गए। वहां 27 सितम्बर 1833 को ब्रिस्टल (Bristol) के पास स्टाप्लेटोन (Stapleton) में मस्तिष्क ज्वर (Meningitis) के कारण उनका निधन हो गया।

राजा राममोहन राय द्वारा लिखित पुस्तकें

Books written by Raja Rammohan Roy
1. सती: अ राइटअप ऑफ राजा राम मोहन राय अबाउट बर्निंग विडोज़ अलाइव
2. The Precepts of Jesus
3.The English Works of Raja Rammohun Roy
4. Translation of Several Principal Books, Passages and Texts of the Veds and of Some Controversial Works on Brahmunical Theology
5. The Complete Songs of Rammohun Roy
6. Brief Remarks Regarding Modern Encroachments on the Ancient Rights of Females: According to the Hindoo Law of Inheritance
7. Is Postcolonial Theory Bla-Boring? a Return to Primary Texts: Selections from the Writings of Raja Rammohun Roy (1772-1833)
8. A Treatise on Christian Doctrine: Being the Second Appeal to the Christian Public, in Defence of the "precepts of Jesus"
9. Why Has Postcolonial Theory Forgotten India's Islamic Past? Selected Writings of Raja Rammohun Roy (1772-1833).: Recuperating a Hindu-Islamic Metissage Identity

राजा राममोहन राय द्वारा संगठनों की स्थापना

Establishment of organizations by Raja Rammohan Roy
आत्मीय सभा (1814) - समाज में सामाजिक और धार्मिक सुधार शुरू करने हेतु। वास्तव में आत्मीय सभा का उद्देश्य समाज में सामजिक और धार्मिक मुद्दों पर पुन: विचार कर परिवर्तन करना था।
ब्रह्म समाज (1828) - ब्रह्मसमाज भारत में पहला धर्म सुधार आंदोलन था, जिसका सम्बंध हिन्दू धर्म से था। ब्रह्मसमाज 19वीं शताब्दी के नवजागरण भारत की विशेषता थी। ब्रह्म समाज की स्थापना राजा राममोहन राय ने 20 अगस्त 1828 ई. को कोलकाता में की थी। राजा राममोहन राय के बाद ब्रह्म समाज का संचालन देवेंद्र नाथ ठाकुर ने किया।
ब्रह्म समाज का उद्देश्य हिन्दू समाज में फैली बुराईयों, जैसे सती प्रथा, बहु-विवाह, वेश्यागमन, जातिवाद, अस्पृश्यता आदि को समाप्त करना था।
 1865 ई. में केशव चंद्र सेन के अत्यधिक उदारवादी दृष्टिकोण के चलते ब्रह्मसमाज में पहली फूट पड़ी। 1865 ई. में देवेन्द्रनाथ ने केशवचन्द्र को ब्रह्मसमाज से बाहर निकाल दिया। देवेन्द्रनाथ ठाकुर के अनुयायियों ने 'आदि ब्रह्मसमाज' का गठन किया। आदि ब्रह्मसमाज का नारा था- 'ब्रह्मवाद ही हिन्दूवाद है।' केशव चंद्र सेन ने सन 1866 में "भारतवर्षीय ब्रह्मसमाज" नाम की संस्था की स्थापना की।
इस संगठन के द्वारा 1829 में राज राममोहन राय ने गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक के द्वारा कानून बनाकर सती प्रथा को अवैध घोषित किया।

राजा राममोहन राय पत्र पत्रिकाएं

Raja Rammohan Roy letter magazines
1. ब्रह्ममैनिकल पत्रिका
2. संवाद कौमुदी ,1821 (बंगाली)
3. मिरात-उल-अखबार, 1822 (पर्शियन)
4. बंगदूत कलकत्ता से (इस समाचार पत्र में बांग्ला, हिन्दी, बनारसी और उर्दू भाषा का एक साथ प्रयोग किया जाता था)
5. इशोपनिषद, कठोपनिषद और मूंडुकोपनिषद का अनुवाद। (संस्कृत से हिंदी, इंग्लिश और बंगाली भाषा में अनुवाद)
6. गाइड टू पीस एंड हैप्पीनेस
7. गौडिया व्याकरण 1826
8. ब्राह्मापोसना 1828
9. ब्रहामसंगीत 1829
10. दी युनिवर्सल रिलिजन 1829

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राजा राममोहन राय को प्राप्त सम्मान और पुरस्कार

Raja Rammohan Roy received honors and awards
राजा राममोहन राय को दिल्ली के मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के द्वारा 1829 में 'राजा' की उपाधि दी गयी थी। जब अकबर द्वितीय का राजदूत बनकर राजा राममोहन राय यूनाइटेड किंगडम गए तो वहां के सम्राट विलियम ४ ने भी उनका अभिनंदन किया
उनके वेदों और उपनिषद के संस्कृत से हिंदी, इंग्लिश और बंगाली भाषा में अनुवाद के लिए फ्रेंच सोसायटी Asiatique ने उन्हें 1824 में सम्मानित भी किया.

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