गुट-निरपेक्ष आन्दोलन (NAM) : अर्थ, उद्भव के कारण, उद्देश्य, स्थापना

इस आर्टिकल में गुट निरपेक्ष आंदोलन क्या है, गुट निरपेक्षता का अर्थ, गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना, गुटनिरपेक्ष आंदोलन के पीछे मूल विचार, गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रकृति और उद्देश्य, गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य देश आदि के बारे में चर्चा की गई है।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन क्या है

गुटनिरपेक्ष आंदोलन शीत युद्ध के संदर्भ में पनपा, जब विश्व दो खेमों में बंट चुका था। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के नव स्वतंत्र देशों ने एक तीसरा विकल्प चुना यही गुटनिरपेक्ष आंदोलन था। गुटनिरपेक्षता का अर्थ समझने के लिए निम्न अवधारणाओं को समझना जरूरी है :

स्थायी तटस्थीकरण : इसका संबंध ऐसे राज्य से है जो ऐच्छिक या परिस्थितियों के दबाव के कारण स्थाई रूप से तटस्थ रहता है। जैसे : स्वीटजरलैंड।

तटस्थता (Neutrality) : अंंतर्राष्ट्रीय कानून में तटस्थता एक ऐसी अवधारणा है जिसका संबंध केवल युद्ध की अवस्था से है। जब दो देशों के मध्य युद्ध हो रहा हो तब ऐसा देश जो उन दोनों देशों के प्रति तटस्थ रहता है अथवा भाग नहीं लेता है तो उस राष्ट्र की नीति तटस्थता की नीति कहीं जाएगी।

गुटनिरपेक्षता का अर्थ क्या है

गुटनिरपेक्षता का अर्थ अन्य राज्यों के सैनिक समझौतों में भाग न लेना है। गुट निरपेक्षता का अर्थ अलगाव की नीति नहीं लिया जाना चाहिए। गुटनिरपेक्ष देश विश्व की राजनीति में सक्रिय भूमिका अदा करने में विश्वास करते हैं। गुटनिरपेक्षता एक नीति है। गुट निरपेक्ष राज्य शीत युद्ध से अलग रहते हैं।

पंडित नेहरू के अनुसार गुटनिरपेक्षता का अर्थ, “गुटनिरपेक्षता का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि हम चुप रहेंगे। जहां भी अन्याय होगा, स्वतंत्रता को खतरा होगा या किसी पर आक्रमण किया जाएगा, हम उसका विरोध करेंगे और ऐसे समय में हम तटस्थ भी नहीं रहेंगे।”

NAM का अर्थ पृथकतावाद या तटस्थता नहीं है, बल्कि उसका मुख्य उद्देश्य दो गुटों (अमेरिका और सोवियत संघ) के बीच आपसी तनाव और युद्ध को रोकना है और दोनों गुटों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना है।

गुटनिरपेक्षता के अर्थ निम्नलिखित हैं :

  • गुटों से पृथक रहना
  • शीत युद्ध में भाग न लेना
  • तटस्थ नहीं रहना
  • अंतर्राष्ट्रीय समस्या का गुण-दोषों के आधार पर निर्णय करना
  • विरोधी गुटों के बीच संतुलन बनाए रखना

गुटनिरपेक्षता शब्द शायद जवाहरलाल नेहरू ने गढा था और वह भी इससे बहुत प्रसन्न नहीं थे। क्योंकि इस शब्द में प्रकटतः एक निषेधात्मक ध्वनि है। गुटनिरपेक्षता को अप्रतिबद्धत, तटस्थता, तटस्थतावाद, सकारात्मकता तटस्थता, सकारात्मक तटस्थतावाद, गतिशील तटस्थता, स्वतंत्र और सक्रिय नीति और शांतिपूर्ण सक्रिय सह-अस्तित्व भी कहा जाता है।

जॉर्ज श्वार्जनबर्गर के अनुसार यह मैत्री संधियों अथवा गुटों से बाहर रहने की नीति है। गुट निरपेक्षता का सार तत्व यह है कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों में, विशेषतः दोनों सर्वोच्च शक्तियों के प्रति नीतियों और अभिवृत्तियों के संदर्भ में नीति और कार्यवाही की पर्याप्त स्वतंत्रता बनाए रखी जाए।

गुट निरपेक्षता का अर्थ शक्तिमूलक राजनीति से पृथक रहना तथा सभी राज्यों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय सहयोग है, चाहे वह राष्ट्र गुटबद्ध हो या गुटनिरपेक्ष हो।

शीत युद्ध से प्रथक्करण ही गुट निरपेक्षता का सार तत्व है। यह नीति चुप्पी लगाकर बैठ जाने की या अंतर्राष्ट्रीय मामलों से संन्यास लेने की नहीं है, बल्कि इसके अंतर्गत स्वतंत्र राष्ट्रों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए जाते हैं और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में न्यायपूर्ण ढंग से सक्रिय भाग लिया जा सकता है। सन 1961 में गुटनिरपेक्षता के तीन कर्णधार नेहरू, नासिर और टीटो ने इसके पांच आधार स्वीकार किए थे –

गुटनिरपेक्ष आंदोलन के पांच आधार तत्व

  • सदस्य देश स्वतंत्र नीति पर चलता हो
  • सदस्य देश उपनिवेशवाद का विरोध करता हो
  • सदस्य देश किसी सैनिक गुट का सदस्य देश
  • किसी बड़ी ताकत के साथ द्विपक्षीय समझौता नहीं किया हो
  • सदस्य देश ने किसी बड़ी ताकत को अपने क्षेत्र में सैनिक अड्डा बनाने की अनुमति न दी हो।

अर्थात वही देश गुटनिरपेक्ष माने जा सकते हैं जो स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करते हैं। राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन का समर्थन करते हो,शक्ति या सैनिक गुटों के सदस्य न हो। दूसरे शब्दों में, एक दूसरे के विरोधी शक्ति शिविरों से दूर रहने वाले, युद्ध की विभीषिका को टालने वाले, तनाव को कम करने वाले और शांति समर्थक देश ही गुट निरपेक्षता का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं।

संक्षेप में गुटनिरपेक्षता से अभिप्राय है, अपनी स्वतंत्र रीति नीति। गुटों से अलग रहने से हर प्रश्न के औचित्य या अनौचित्य को देखा जा सकता है। किसी एक गुट के साथ संबद्ध होकर उचित अनुचित का विचार किए बिना ही अंधानुकरण या समर्थन करना गुटनिरपेक्षता नहीं है।

अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था, “भारत की गुटनिरपेक्षता सोवियत संघ की ओर झुकी हुई है अतः इसे संतुलित करना असली गुटनिरपेक्षता है।”

असली गुटनिरपेक्षता (1977 से 1979)

जनता पार्टी के घोषणा पत्र में ‘असली गुटनिरपेक्षता’ की बात कही गई थी। मोरारजी देसाई का कहना था कि इंदिरा गांधी के जमाने में विदेश नीति एक तरफ झुकी गयी थी। इस झुकाव को दूर करना ही असली गुटनिरपेक्षता है।

विदेश मंत्री वाजपेई के शब्दों मेंं, “भारत को न केवल गुटनिरपेक्ष रहना चाहिए बल्कि वैसा दिखाई भी पड़ना चाहिए।” उनके अनुसार असंलग्नता का मतलब है सर्व सलंग्नता अर्थात सब के साथ जुड़ना, सब के साथ गठबंधन करना।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक

  1. जोसेफ ब्रॉज टीटो – युगोस्लाविया
  2. जवाहरलाल नेहरू – भारत
  3. गमाल अब्दुल नासिर – मिश्र (इन तिनों ने 1956 मे एक सफल बैठक की।)
  4. सुकर्णो – इंडोनेशिया
  5. वामें एनक्रुमा – घाना (इन दोनों ने इसका समर्थन किया।)

गुटनिरपेक्ष आंदोलन के पीछे मूल विचार क्या थे

गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्भव का कारण कोई संयोग मात्र नहीं था, अपितु यह सुविचारित अवधारणा थी। गुटनिरपेक्ष आंदोलन का उद्देश्य नवोदित राष्ट्रों की स्वाधीनता की रक्षा करना एवं युद्ध की संभावनाओं को रोकना था।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उदय के पीछे मूल विचार यह था कि साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने वाले देशों को शक्तिशाली गुटों से अलग रखकर उनकी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखा जाए।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व विरोधी गुटों में हो चुका था और दूसरी तरफ एशिया एवं अफ्रीका के राष्ट्रों का स्वतंत्र अस्तित्व उभरने लगा था। अमेरिकी गुट एशिया के इन नवोदित राष्ट्रों पर तरह तरह के दबाव डाल रहा था कि उसके गुट में शामिल हो जाएं, लेकिन एशिया के अधिकांश राष्ट्र पश्चिमी देशों की भांति गुटबंदी में विश्वास नहीं करते थे। वे सोवियत साम्यवाद और अमेरिकी पूंजीवाद दोनों को अस्वीकार करते थे।

वे अपने आप को किसी वाद के साथ संबंध नहीं करना चाहते थे और उनका विश्वास था कि उनके प्रदेश तीसरी शक्ति (Third Power) हो सकते हैं जो गुटों के विभाजन को अधिक जटिल संतुलन में परिणित करके अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में सहायक हो सकते हैं।

गुटों से अलग रहने की नीति अर्थात गुटनिरपेक्षतावाद एशिया के नवजागरण की प्रमुख विशेषता थी। सन 1947 में स्वतंत्र होने के उपरांत भारत ने भी इस नीति का पालन शुरू किया, उसके बाद एशिया के अनेक देशों ने इस नीति मेेे अपनी आस्था व्यक्त की। जैसे-जैसे अफ्रिका के देश स्वतंत्र होतेे गए, वैसे-वैैसे उन्होंने भी इस नीति का अवलम्बन करना शुरू कर दिया।

भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, मिस्र के राष्ट्रपति नासिर तथा यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो ने ‘तीसरी शक्ति’ की अवधारणा को मजबूत बनाया।

एफ्रो-एशियाई एकता

नेहरू की अगुवाई में मार्च 1947 में एशियाई संबंध सम्मेलन (एशियन रिलेशन कॉन्फ्रेंस) का आयोजन किया गया। इंडोनेशिया की आजादी के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन तथा दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद का विरोध किया गया।

बांडुंग (इंडोनेशिया) में एफ्रो-एशियाई सम्मेलन 1955 में आयोजित किया गया और NAM आंदोलन की नींव पड़ी और 1961 में बेलग्रेड में पहला NAM सम्मेलन संपन्न हुआ।

1961 में बेलग्रेड में हुए गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रथम सम्मेलन में भाग लेने वाले गुटनिरपेक्ष देशों की संख्या 25 थी, वही आज गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सदस्यों की संख्या 120 हो गई है, तथा 17 पर्यवेक्षक देश भी शामिल हैं। गुट निरपेक्ष संघ में अफ्रीका का प्रतिनिधित्व सबसे बेहतर है जहां सभी 53 अफ्रीकी देश इसके पूर्णकालिक सदस्य हैं।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्य

गुटनिरपेक्ष आंदोलन का उद्देश्य उपनिवेशवाद से मुक्त हुए देशों को स्वतंत्र नीति अपनाने में समर्थ बनाना था और किसी भी सैन्य संगठन में शामिल होने से इंकार करना था। आर्थिक विकास के संदर्भ में ‘नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था’ की धारणा का जन्म हुआ। 1972 में UNO के व्यापार और विकास से संबंधित सम्मेलन (अंकटाड) में ‘टुवार्ड ए न्यू ट्रेड पॉलिसी फॉर डेवलपमेंट’ नाम से रिपोर्ट प्रस्तुत हुई।

1961 में बेलग्रेड सम्मेलन में आर्थिक मुद्दा महत्वपूर्ण नहीं था। 1970 के दशक में आर्थिक मुद्दे प्रमुख हो उठे और NAM आर्थिक दबाव समूह बन गया। 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध तक नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के प्रयास मंद पड़ गए क्योंकि विकसित देशों द्वारा इनका विरोध किया जाने लगा।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन : एक नजर

  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का मुख्यालय जकार्ता (इंडोनेशिया) में है।
  • NAM के पास कोई औपचारिक संस्थापक चार्टर या संधि नहीं है, न ही इसका कोई स्थायी सचिवालय है। अध्यक्षता करने वाला देश सम्मेलन के मामलों के समन्वय और प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है।
  • NAM के महासचिव होस्नी मुबारक है।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना 1 सितंबर 1961 को हुई।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन का प्रथम सम्मेलन 1961 मे बेलग्रेड मे हुआ जिसके प्रथम अध्यक्ष जोसिप ब्रॉज टीटो (यूगोस्लाविया) है।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन का समन्वयक ब्यूरो न्यूयॉर्क (USA) में है।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की स्थापना के समय 25 सदस्य देश थे।
  • वर्तमान में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के 120 सदस्य देश है।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन के 17 पर्यवेक्षक देश है।
  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन के 10 पर्यवेक्षक संगठन है।
  • 2024 में कंपाला (युगांडा) के द्वारा गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non Aligned Movement-NAM) के 19वें शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की गई। युगांडा ने वर्ष 2027 तक के लिये इसकी अध्यक्षता ग्रहण की है।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना कब हुई?

    उत्तर : 1961 में गुटनिरपेक्ष देशों के बेलग्रेड में प्रथम शिखर सम्मेलन में 25 देशों की भागीदारी से यह आंदोलन आरम्भ हुआ था।

  2. गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक कौन थे?

    उत्तर : गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक जोसेफ ब्रॉज टीटो (युगोस्लाविया) जवाहरलाल नेहरू (भारत), गमाल अब्दुल नासिर (मिश्र) ने 1956 मे एक सफल बैठक की तथा सुकर्णो (इंडोनेशिया) वामें एनक्रुमा (घाना) इन दोनों ने इसका समर्थन किया।

  3. गुटनिरपेक्ष आंदोलन से आप क्या समझते हैं?

    उत्तर : गुटनिरपेक्ष आंदोलन शीत युद्ध के संदर्भ में पनपा, जब विश्व दो खेमों में बंट चुका था। एशिया अफ्रीका और लातिन अमेरिका के नव स्वतंत्र देशों ने एक तीसरा विकल्प चुना यही गुटनिरपेक्ष आंदोलन था।

  4. गुटनिरपेक्ष आंदोलन के पीछे मूल विचार क्या थे?

    उत्तर : गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उदय के पीछे मूल धारणा यह थी कि साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने वाले देशों को शक्तिशाली गुटों से अलग रखकर उनकी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखा जाए।

My name is Mahendra Kumar and I do teaching work. I am interested in studying and teaching competitive exams. My qualification is B.A., B.Ed., M.A. (Pol.Sc.), M.A. (Hindi).

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