विधि के शासन की भारतीय और पाश्चात्य मान्यता

इस आर्टिकल में विधि के शासन की भारतीय और पाश्चात्य मान्यता के बारे में चर्चा की गई है।

विधि के शासन की भारतीय मान्यता

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में व्यक्ति के शासन की तुलना में विधि का शासन श्रेष्ठ माना गया है। राज्य के स्थायित्व और लोककल्याण के लिए विधि के शासन को अनिवार्य आवश्यकता माना गया है जिसके बिना एक सभ्य और सुसंस्कृत नागरिक जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।

भारतीय चिंतन परंपरा में मनु, कौटिल्य तथा शुक्र आदि विचारकों ने शासक पर 'धर्म' अर्थात विधि के नियंत्रण की बात को स्वीकार किया है। राजकीय दायित्वों को 'राजधर्म' की संज्ञा दी गई है तथा राज्य को धर्म के अधीन माना है।

मनु के अनुसार राजा का प्रमुख दायित्व प्रजा की रक्षा तथा राज्य का उद्देश्य लोक कल्याण है। राजकीय शक्ति के प्रयोग में शासक को सदैव धर्म से शासित होने का परामर्श देते हुए चेतावनी दी है कि राजकीय शक्ति का मनमाने ढंग से किया गया प्रयोग स्वयं राजा के अस्तित्व के लिए ही संकटकारी होगा।

कौटिल्य ने अपने ग्रंथ 'अर्थशास्त्र' में सप्तांग सिद्धांत के अंतर्गत राजा (स्वामी) को सर्वोच्च स्थिति प्रदान की है किंतु उसकी शक्तियों को असीमित नहीं माना है। कौटिल्य ने राजकीय आज्ञा को कानून का स्रोत नहीं माना है वरन् यह स्वीकार किया है कि राज्य जन इच्छाओं, जन समर्थन तथा जन सहमति का विरोध नहीं कर सकता और स्थापित धर्म, प्रचलित परंपराओं और शिष्टाचार के विरुद्ध कोई आदेश जारी नहीं कर सकता।

शुक्र ने शुक्रनीति में प्रजा की उन्नति तथा सुरक्षा को राज्य के अस्तित्व का आधार माना है। शुक्र ने राजा को प्रजा की भौतिक सुरक्षा के लिए ही नहीं वरन् प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए भी उत्तरदाई माना है। शुक्रनीति में शासन की निरंकुश व अमर्यादित शक्तियों का समर्थन नहीं किया है और शासन से शासकीय शक्तियों का प्रयोग विधि व धर्म के अनुरूप ही करने की अपेक्षा की गई है।

विधि के शासन की पाश्चात्य मान्यता

पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन में प्लेटो, अरस्तू तथा एक्विनास आदि ने विधि के शासन का ही समर्थन किया है। प्लेटो ने अपने ग्रन्थ 'द स्टेट्समैन' तथा 'द लॉज' में विधि के शासन और विधि की सर्वोच्च सत्ता का समर्थन किया है और कहां है कि राज्य में शासन और शासित सभी के आचरण का नियमन राज्य के मौलिक कानून द्वारा ही होना चाहिए 

अरस्तू ने विधि की सर्वोच्चता का समर्थन करते हुए कहा है कि ''ठीक प्रकार से बनाए गए कानून ही अंतिम प्रभु होने चाहिए। व्यक्ति के शासन की तुलना में विधि का शासन श्रेयस्कर है क्योंकि विधि ऐसा विवेक है जिस पर व्यक्ति की इच्छा का प्रभाव नहीं पड़ता।''

संत थॉमस एक्विनास ने ही ने भी विधि के शासन को सर्वोत्तम माना है। एक्विनास के अनुसार कानून के चार प्रकार हैं -

  1. शाश्वत कानून
  2. प्राकृतिक कानून
  3. मानवीय कानून और
  4. दैव्य कानून।

एक्विनास का मानना है कि मानवीय कानून अनिवार्य रूप से प्राकृतिक कानून के अनुकूल होने चाहिए। इसी प्रकार एक्विनास शासन की स्वेच्छाचारी अंकुश लगाने का प्रयत्न करता है।

प्राचीन चीनी विचारक कन्फ्यूशियस का मत था कि राजा देवपुत्र होता है किंतु उसे स्वेच्छाचारी शासन का अधिकार प्राप्त नहीं होता। राजा को सदैव ही नैतिकता एवं परंपराओं का पालन करते हुए विधि बनाने का अधिकार होता है तथा उसे लोक कल्याण, औचित्य तथा अनुष्ठान (जेन, ही तथा ली) के सिद्धांत के अनुसार ही शासन करना चाहिए।

My name is Mahendra Kumar and I do teaching work. I am interested in studying and teaching competitive exams. My qualification is B.A., B.Ed., M.A. (Pol.Sc.), M.A. (Hindi).

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