शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में संप्रेषण कौशल का प्रयोग

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संप्रेषण कौशल क्या है

संप्रेषण से अभिप्राय दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य विचारों, सूचनाओं, तथ्यों तथा अनुभवों का आदान-प्रदान है। कौशल से अभिप्राय किसी कार्य को दक्षता पूर्वक करने की सामर्थ्य अर्जित करना। यह विकसित अभिक्षमता या योग्यता है।

अतः संप्रेषण कौशल वे हैं जिन्हें सीखा जा सकता है और जिनका प्रयोग संदेश के प्रभावी संप्रेषण हेतु किया जाता है। ये संप्रेषण दक्षता में वृद्धि करते हैं।

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में संप्रेषण कौशल के द्वारा शिक्षण को प्रभावशाली बनाया जा सकता है। प्रभावी संप्रेषण कौशल कक्षा-कक्ष अंतः क्रिया का आधार है। बिना संप्रेषण के शिक्षण संभव नहीं है।

अतः यह आवश्यक है कि एक शिक्षक को अच्छा सम्प्रेषक (सूचना देने वाला) होना चाहिए। यदि सम्प्रेषक द्वारा प्रेषित संदेश का वांछित प्रभाव पड़ता है तो उसके व्यवहार में वांछित परिवर्तन होता है।

संप्रेषण की कुशलता इस बात से प्रदर्शित होती है कि वह कितनी दक्षता तथा कुशलता से सम्प्रेषी (सूचना प्राप्त करने वाला) के व्यवहार में परिवर्तन लाती है।

संप्रेषण की सफलता के लिए जरूरी है कि सम्प्रेषी संदेश को ध्यानपूर्वक सुनकर ग्रहण कर पाए अन्यथा संप्रेषण अपूर्ण ही रहेगा।

इसलिए शिक्षक और छात्र दोनों में संप्रेषण कौशलों का विकास करना आवश्यक है। संप्रेषण कौशलों को दो भागों में बांटा जा सकता है :

(१) सुनने का कौशल और (२) कहने का कौशल

सुनने का कौशल (Skill of Listening)

शिक्षण में बहुत सी समस्याओं का समाधान अध्यापक द्वारा ध्यानपूर्वक सुनने के कौशल का विकास करने से हो सकता है। सुनने के कौशल का विकास करने के लिए अध्यापक चार चरणों का अनुसरण करें तो वह विद्यार्थियों को स्वयं समस्या का समाधान करने के लिए प्रेरित कर सकता है। इसे संक्षेप में SLLR कहते हैं।

  • रुको (Stop)
  • देखो (Look)
  • सुनो (Listen)
  • अनुक्रिया करो (Respond)

अध्यापक को अच्छे वक्ता के साथ एक अच्छा श्रोता भी होना चाहिए तभी वह छात्रों में भी सुनने के कौशल का विकास कर सकता है।

कहने या बालने का कौशल (Skill of Speaking)

बोलना हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण कौशल है। दूसरे व्यक्ति बेहतर समझ पाए इसके लिए जरूरी है कि सम्प्रेषक को अपनी कहने की कला को प्रभावी बनाना चाहिए। किसी भी क्षेत्र में संप्रेषी तक अपनी पहुंच बनाने के लिए यह आवश्यक है कि सम्प्रेषक अपनी बात को प्रभावी व दोष रहीत तरीके से प्रस्तुत करें। प्रभावी तरीके से बोलने के निम्न तत्व है –

(1) शारीरिक भाषा एवं स्थिति : शिक्षण अधिगम अंतः क्रिया में व्यक्ति न केवल शब्दों से ही अपनी बात या विचार को संप्रेषी तक पहुंचाता है बल्कि उसका पूरा व्यक्तित्व चेहरे के भाव, आंखों के संकेत, मुख मुद्रा आदि का भी उल्लेखनीय प्रभाव पड़ता है।

(2) नेत्र संपर्क : नेत्र संपर्क सुनने वाले से तादात्म्य स्थापित करने के लिए एक प्रभावी साधन है।

(3) आवाज में परिवर्तन : विषय की प्रकृति तथा आवश्यकता के अनुसार आवाज में उतार-चढ़ाव लाना चाहिए।

(4) प्रस्तुतीकरण : प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण के लिए जरूरी है कि संप्रेषक अपने द्वारा दिए जाने वाले भाषण या वक्तव्य को समय के अनुसार व्यवस्थित एवं विषय वस्तु को क्रमबद्ध कर ले। प्रारंभिक भूमिका प्रभावी होनी चाहिए जो श्रोताओं का ध्यान केंद्रित करके उन्हें जिज्ञासु बना सकते।

संबंधित संदर्भों, विद्वानों द्वारा कहे गए कथनों, लोकोक्तियों, मुहावरे, व्याख्याओं का प्रयोग प्रस्तुतीकरण को प्रभावी बनाता है। समापन में मुख्य बिंदुओं का संक्षिप्तीकरण करते हुए वक्तव्य समाप्त करना चाहिए।

संम्प्रेषण संबंधी कुशलताएं

संप्रेषण संबंधी कौशलों का प्रयोग करके शिक्षक अपनी बात विद्यार्थियों तक पहुंचाता है।

(1) वर्णन या विवेचन : शिक्षक को कक्षा कक्ष में किसी घटना, दृश्य, स्थिति या प्रसंग का वर्णन या विवेचन मौखिक रूप से करना होता है। यह वर्णन जितना सहज, सरल, सजीव होगा उतना ही रुचिकर होगा और विद्यार्थियों के मस्तिष्क में उसका एक मानसिक चित्र बन जाएगा अर्थात वे उसे सरलतापूर्वक ग्रहण कर लेंगे।

जैसे किसी मनोरम पहाड़ी स्थल के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन, देशप्रेम, वीरता, युद्ध और शांति आदि वैचारिक विषयों या कोई घटना 1857 की क्रांति, भारत छोड़ो आंदोलन का भी अध्यापक विवेचन वर्णन करता है।

सफल विवेचन के लिए यह आवश्यक है कि शिक्षक अपनी बात का संप्रेषण उचित हाव भाव, स्पष्ट आवाज, रुचिकर उदाहरणों के साथ करें ताकि ग्राही में वही संवेग जागृत हो जाए जो वास्तविक घटना को देखने से होते हैं। इसमें वर्णन शैली, भाषा, विषय वस्तु का क्रम, स्तर के अनुकूल व्यापकता का बहुत महत्व है।

(2) व्याख्या : व्याख्या द्वारा पाठ्य सामग्री के प्रत्येक भाव को सरल भाषा में स्पष्ट किया जाता है। इसमें पाठ की प्रत्येक समस्या, कठिनाई को गहराई के साथ विश्लेषण द्वारा अलग अलग करके समझा जाता है।

जैसे भाषा शिक्षण में कठिन शब्दों, दोहों, वाक्यों आदि को स्पष्ट करने के लिए व्याख्या की आवश्यकता होती है। विज्ञान में विभिन्न प्राकृतिक या भौतिक घटनाओं की वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर व्याख्या की जाती है।

कभी-कभी आलोचना तथा सृजनात्मक स्तर पर भी व्याख्या करनी पड़ती है। आलोचनात्मक व्याख्या के अंतर्गत पाठ में कही गई बात, भाव या विचार का मूल्यांकन कर उसके गुण-दोषों का विवेचन करना होता है।

(3) विचार-विमर्श : ध्यानपूर्वक सुनना और भली प्रकार उत्तर देना, विचार-विमर्श के द्वारा इस कुशलता का विकास किया जाता है। इसके अभ्यास द्वारा व्यक्ति स्वयं अपने विचारों को नियंत्रित करने तथा दूसरों को प्रभावित करके प्रासंगिक व सकारात्मक ढंग से विचार व्यक्त करने के लिए प्रेरित कर सकता है।

(4) अभिनय : कहानी पुस्तक या एकांकी को भली-भांति समझने के लिए अभिनय कौशल का सहारा लिया जाता है। किसी घटना के वर्णन को प्रभावशाली बनाने के लिए भी अभिनय कला का सहारा लिया जाता है।

अभिनय कला में निपुण सम्प्रेषक अपने विषय वस्तु को प्रस्तुत करते समय उसमें नाटकीयता का समावेश कर देता है। ऐसा करने से न केवल कहानी या एकांकी का पढ़ना सार्थक होता है बल्कि अध्यापक का विषय विवेचन भी रूचिकर हो जाता है। शिक्षण में अभिनय के संयोग से नीरस विषय को भी सरस बनाया जा सकता है।

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया के रूप में संप्रेषण

शिक्षण का मुख्य कार्य विद्यार्थियों को अधिगम हेतु सुविधा प्रदान करना तथा उनके व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाना है। शिक्षण प्रक्रिया को दो मुख्य अवयवों में विभाजित किया जाता है – पाठ्यवस्तु और संप्रेषण

पाठ्यवस्तु – के स्वरुप के अनुसार उसे अलग-अलग प्रकार से तीन प्रमुख संयंत्रों, स्मृति,बोध एवं चिंतन स्तर पर प्रस्तुत किया जाता है।

संप्रेषण – शिक्षण प्रक्रिया का दूसरा महत्वपूर्ण अवयव संप्रेषण है। शिक्षण एवं अधिगम के समस्त स्वरूपों क्रमशः औपचारिक तथा अनौपचारिक,आकस्मिक तथा प्रासंगिक के अंतर्गत संप्रेषण प्रक्रिया सर्वत्र एवं सहज रूप में निरंतर गतिमान रहती है। कक्षा कक्ष में अन्य क्रियाएं उतना महत्व नहीं रखती जितनी की संप्रेषण की प्रक्रिया।

कक्षा शिक्षण की परिस्थितियों के सम्यक् विश्लेषण एवं मूल्यांकन का मुख्य आधार सम्प्रेषण है। शिक्षक विषय वस्तु को अपने शाब्दिक एवं अशाब्दिक व्यवहार द्वारा विद्यार्थियों के समक्ष प्रस्तुत करता है। कक्षा कक्ष में शाब्दिक व अशाब्दिक संप्रेषण द्वारा शिक्षक छात्र अंत:क्रिया चलती है।

सम्प्रेषण द्वारा अध्यापक छात्रों को सूचनाओं का ज्ञान कराता है संप्रेषण द्वारा शिक्षक जो भी ज्ञान सूचनाएं तथा तथ्य छात्रों को देते हैं छात्र उसके अर्थ को समझकर अनुक्रीया करते हैं। इस प्रकार कक्षा कक्ष में प्रभावी संप्रेषण द्वि-मार्गी होता है। विचारों के आदान-प्रदान से दोनों के मध्य अंतः क्रिया निर्बाध रूप से चलती रहती है।

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में संप्रेषण के प्रमुख तत्व

संप्रेषण के पांच प्रमुख तत्व हैं जो शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में संप्रेषण के पांचों तत्व विद्यमान होते हैं।

  1. स्त्रोत /सम्प्रेषक (शिक्षक) (Sender)
  2. संदेश (सूचनाएं) (Massage)
  3. माध्यम (मौखिक, दृश्य श्रव्य) (Medium)
  4. ग्राही (विद्यार्थी) (Receiver)
  5. प्रतिपुष्टि (व्यवहार परिवर्तन) (Feedback)

संप्रेषण के  प्रतिमान : शैनन-वीवर प्रतिमान

यह संप्रेषण प्रतिमान शैनन तथा वीवर द्वारा 1949 में विकसित किया गया। इस प्रतिमान के अनुसार संदेश, प्रेषक के द्वारा किसी संप्रेषण माध्यम के जरिए संप्रेषी तक पहुंचता है। सूचना संचरण के मार्ग में उपस्थित बाधाएं संदेश को विरूपित कर सकती है।

जिन्हें प्रभावी संप्रेषण के लिए दूर करने की आवश्यकता होती है। यह बाधाएं कई प्रकार की हो सकती है। जैसे – वातावरणीय शोर, माध्यम का त्रुटिपूर्ण होना, संप्रेषी की मनोवैज्ञानिक स्थिति, भाषा संबंधी त्रुटियां आदि।

संप्रेषी, संदेश को ग्रहण करके अर्थापन करता है और अपनी प्रतिक्रिया संप्रेषक को भेजता है। यह प्रतिक्रिया ही सम्प्रेषक के लिए पृष्ठपोषण का कार्य करती है। इससे संप्रेषण की प्रभावोत्पादकता का पता लगता है। प्रतिक्रिया से संचरण की कमियों को जानने के बाद संप्रेषी सुधार हेतु उपाय करता है। इस प्रकार संप्रेषण एक द्वि-मार्गी क्रिया है।

कक्षा कक्षा संप्रेषण को प्रभावी बनाने एवं बाधाओं को दूर करने के उपाय

  • संप्रेषण हेतु उचित भाषा का प्रयोग
  • स्वर की उपयुक्तता
  • संप्रेषण माध्यमों का उचित प्रयोग
  • अध्यापक के हाव भाव एवं शारीरिक भाषा
  • संदेश की स्पष्टता
  • सौहार्दपूर्ण व्यवहार एवं मानवीय संबंध
  • पूर्व ज्ञान का समुचित प्रयोग
  • अभिप्रेरित करना
  • व्यक्तिगत विविधताओं के अनुकूल
  • भौतिक बाधाओं को दूर करना
  • शारीरिक बाधाओं को दूर करना
  • प्रतिपुष्टि का प्रयोग
  • उपयुक्त संप्रेषण नीतियों का प्रयोग

शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में संप्रेषण का महत्व

Importance of Communication in Teaching Process : संप्रेषण शिक्षण अधिगम प्रक्रिया का महत्वपूर्ण अंग है। कक्षा कक्ष शिक्षण बिना संप्रेषण के संभव नहीं है। किसी भी संगठन में संप्रेषण द्वारा ही संगठन के अधिकारियों, कर्मचारियों में विचारों का आदान प्रदान संभव है। शिक्षण में संप्रेषण की आवश्यकता को निम्न बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है –

  • शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में प्रभावी संप्रेषण द्वारा विद्यार्थी के व्यवहार में वांछित परिवर्तन संभव है।
  • प्रभावी संप्रेषण द्वारा शिक्षण के उद्देश्यों की प्राप्ति अपेक्षित स्तर तक की जा सकती है।
  • अध्यापक नवीन सूचनाओं, नियमों, सिद्धांतों को विद्यार्थियों तक सहजता से पहुंचा सकता है।
  • प्रभावी संप्रेषण से शिक्षण की गुणवत्ता में वृद्धि होती है और विद्यार्थियों के उपलब्धि स्तर में वृद्धि होती है।
  • प्रभावी संप्रेषण विद्यार्थियों को उचित अनुक्रिया करने के लिए प्रेरित कर सकता है और विद्यार्थियों को अभिव्यक्ति का उपयुक्त अवसर मिलता है।
  • प्रभावी संप्रेषण द्वारा अध्यापक छात्र संबंध अनौपचारिक, मधुर तथा अधिक सौहार्दपूर्ण होते हैं।
  • प्रभावी संप्रेषण समस्याओं के शीघ्र समाधान करने में सहायक होता है, क्योंकि इसके द्वारा संप्रेषी अपनी बात को सही रूप में दूसरे व्यक्ति तक पहुंचा पाता है।
  • प्रभावी संप्रेषण कक्षा समूह के सदस्यों में आपसी विश्वास, समझ तथा सहयोग की भावना विकसित करने में सहायता करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में सूचना एवं संचार तकनीकी का क्या महत्व है?

    उत्तर : सूचना एवं संचार तकनीकी द्वारा विद्यार्थियों को उनकी योग्यतानुसार पाठ्य सामग्री को बोधगम्य बना कर अधिगम कराने में सहायक है। सूचना एवं संचार तकनीकी शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को सरल, सुबोध एवं सुगम बनाने में सहायक है।

  2. संप्रेषण से आप क्या समझते हैं?

    उत्तर : संप्रेषण से अभिप्राय दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य विचारों, सूचनाओं, तथ्यों तथा अनुभवों का आदान-प्रदान है। कौशल से अभिप्राय किसी कार्य को दक्षता पूर्वक करने की सामर्थ्य अर्जित करना। यह विकसित अभिक्षमता या योग्यता है।

  3. संप्रेषण के आधुनिक साधन कौन कौन से हैं?

    उत्तर : सम्प्रेषण के आधुनिक साधन निम्न है – डाक पत्र प्रेषण सेवा, कुरीयर सेवा, टेलीफोन, टेलीग्राम, इन्टरनेट, फैक्स, ई-मेल, वायस मेल, आदि।

  4. शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में संप्रेषण के प्रमुख तत्व कोन से है?

    उत्तर : संप्रेषण के पांच प्रमुख तत्व हैं जो शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में संप्रेषण के पांचों तत्व विद्यमान होते हैं।
    1. स्त्रोत /सम्प्रेषक (शिक्षक)
    2. संदेश (सूचनाएं)
    3. माध्यम (मौखिक, दृश्य श्रव्य)
    4. ग्राही (विद्यार्थी)
    5. प्रतिपुष्टि (व्यवहार परिवर्तन)

My name is Mahendra Kumar and I do teaching work. I am interested in studying and teaching competitive exams. My qualification is B.A., B.Ed., M.A. (Pol.Sc.), M.A. (Hindi).

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