मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत का आलोचनात्मक परीक्षण

इस आर्टिकल में कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत का आलोचनात्मक परीक्षण किया गया है। मार्क्स के अनुसार अतिरिक्त मूल्य क्या है, अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत किसने दिया, अतिरिक्त मूल्य की आलोचना आदि के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है।

कार्ल मार्क्स का अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत : परिचय

अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत (Surplus Value Theory of Karl Marx’s) कार्ल मार्क्स के दर्शन की महत्वपूर्ण आधारशिला है। अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत कार्ल मार्क्स ने दिया था। कार्ल मार्क्स ने अपने इस सिद्धांत को दास केपिटल (Das Capital) नामक पुस्तक में दिया है। कार्ल मार्क्स अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत के माध्यम से यह दर्शाना चाहता है कि किस प्रकार पूंजीपति श्रमिकों का शोषण करते हैं और स्वयं बड़ी मात्रा में पूंजी एकत्रित कर लेते हैं जिसके लिए उन्होंने कोई परिश्रम नहीं किया है। मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य सिद्धांत को अधिशेष मूल्य का सिद्धांत भी कहा जाता है।

मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत को समझने से पूर्व मूल्य के स्वरूप को समझना होगा। मार्क्स वस्तु के मूल्य को पैदा करने वाले दो प्रकार के आधार मानता है। प्रथम आधार उपयोगिता है और द्वितीय आधार विनिमय है।

उपयोगिता मूल्य (Utility value) क्या है

उपयोगिता मूल्य का अर्थ है मनुष्य की इच्छा पूरी करना। जो वस्तुएं मनुष्य की इच्छाएं पूरी करती हैं वे उनके लिए उपयोगी है अतः वे मूल्यवान और महत्वपूर्ण है जो वस्तुएं उसकी इच्छाओं को को पूरा नहीं करती है वह उनके लिए उपयोगी न होने के कारण कोई मूल्य नहीं रखती है।

जैसे अत्यधिक भूखे व्यक्ति के लिए भोजन उपयोगी है, लेकिन भरपेट भोजन कर चुके व्यक्ति के लिए यह उपयोगी नहीं है।

विनिमय मूल्य (change value) क्या है

मूल्य का दूसरा आधार विनिमय है। विनिमय मूल्य उस अनुपात को कहते हैं जिसके आधार पर किसी वस्तु को दूसरी वस्तु के बदले में दिया जाता है।

जैसे एक किसान के पास अनाज अधिक है लेकिन कपड़े नहीं हैं। इसी प्रकार कपड़े के व्यापारी के पास कपड़ा है लेकिन अनाज नहीं है। आवश्यकता के अनुसार किसान और व्यापारी एक दूसरे से वस्तुओं का विनिमय करते हैं। वस्तुओं का विनिमय मूल्य श्रम के आधार पर निश्चित होता है।

यदि एक निश्चित मात्रा में अनाज के बदले एक निश्चित मात्रा में कपड़ा दिया जाता है तो इसका कारण यह है कि दिए गए अनाज के पैदा करने में उतना ही श्रम लगता है जितना दिए गए कपड़े के उत्पन्न करने में।

अतः किसी वस्तु का मूल्य उसमें लगाए गए श्रम के आधार पर निश्चित होता है। किंतु पूंजीपति श्रमिक को उतना ही पारिश्रमिक देता है जिससे वह जीवित रह कर अपना पेट भर सके और अपने परिवार का भरण पोषण कर सके।

अतिरिक्त मूल्य (Surplus Value) क्या है

मार्क्स के अनुसार प्रत्येक वस्तु का मूल्य उस पर खर्च किए गए श्रम के आधार पर होता है। लेकिन बाजार में वह वस्तु ऊंचे दामों पर बेची जाती है और उसके बेचने से प्राप्त होने वाला अतिरिक्त धन पूंजीपति की जेब में जाता है। पूंजीपति द्वारा बिना श्रम के प्राप्त यह पूंजी अतिरिक्त मूल्य है।

मार्क्स के अनुसार, “अतिरिक्त मूल्य उन दो मूल्यों का अंतर है जिसे श्रमिक पैदा करता है और वह वास्तव में पाता है।”

यह ऐसा मूल्य है जिसे पूंजीपति श्रमिक के कारण प्राप्त करता है और जिसके लिए श्रमिक को कुछ भी प्राप्त नहीं होता है।

मैक्सी के अनुसार, “यह वह मूल्य है जिसे पूंजीपति श्रमिकों के खून पसीने की कमाई पर टोल टैक्स के रूप में वसूल करते हैं।”

उदाहरण के लिए यदि कोई पूंजीपति एक पेन बनाने की सामग्री ₹10 में खरीदा है और उसके बनाने वाले मजदूर को ₹3 देता है। इस पेन का मूल्य ₹13 होना चाहिए। लेकिन बाजार में ₹20 में बिकता है। यहां पूंजीपति ₹7 अतिरिक्त मूल्य के रूप में प्राप्त करता है। जिसके लिए वह कोई परिश्रम नहीं करता है।

मार्क्स के अनुसार यह अतिरिक्त मूल्य श्रमिक को मिलना चाहिए। किंतु पूंजीपति उसके श्रम की चोरी करता है। यही चोरी उसका लाभ है। इसी से निरंतर वह पूंजी का निर्माण करता रहता है। उत्पादन की वृद्धि के साथ-साथ अतिरिक्त मूल्य भी बढ़ता रहता है।

पूंजीपति का लक्ष्य अपने धन में निरंतर वृद्धि करना होता है, दूसरी ओर श्रमिक अधिक पारिश्रमिक पाने के लिए श्रमिक संघों का निर्माण करते हैं। आवश्यकता होने पर हड़ताल आदि का सहारा लेते हैं। इस प्रकार पूंजीपतियों व श्रमिकों के बीच संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। यहीं से पूंजीवाद के विनाश की पृष्ठभूमि तैयार हो जाती है।

कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य सिद्धांत की आलोचना

कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की निम्न आधारों पर आलोचना की गई है।

  • किसी वस्तु के मूल्य का निर्धारण केवल श्रम के आधार पर नहीं हो सकता। वस्तुओं के उत्पादन में पूंजी, कच्चा माल, मशीनें, वैज्ञानिक ज्ञान और प्रबंधकीय गुण भी आवश्यक है।
  • पूंजीपति को वस्तुओं के उत्पादन में श्रमिक के अतिरिक्त अन्य बहुत से मदों पर धनराशि व्यय करनी पड़ती है जिसकी मार्क्स उपेक्षा करता है। जैसे कारखानों में समय-समय पर किए गए सुधार, मशीनों की मरम्मत, श्रमिकों को समय समय पर दी जाने वाली सुविधाएं आदि।
  • यह सिद्धांत परस्पर विरोधी है।
  • मार्क्स की यह कल्पना ठीक प्रतीत नहीं होती कि केवल अतिरिक्त मूल्य से ही पूंजी का निर्माण होता है।
  • मूल्य में पूंजीपति द्वारा किए गए विज्ञापन आदि का व्यय भी नहीं जोड़ा गया है जो त्रुटिपूर्ण है।
  • मार्क्स पूंजीपति के मानसिक श्रम की उपेक्षा करता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत किसने दिया था?

    उत्तर : अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत कार्ल मार्क्स ने दिया था।

  2. मार्क्स के अनुसार राज्य किसके द्वारा मजदूरों के शोषण का यंत्र है?

    उत्तर : मार्क्स के अनुसार राज्य पूंजीपतियों के द्वारा मजदूरों के शोषण का यंत्र है।

  3. मार्क्स के अनुसार अतिरिक्त मूल्य क्या है?

    मार्क्स के अनुसार प्रत्येक वस्तु का मूल्य उस पर खर्च किए गए श्रम के आधार पर होता है। लेकिन बाजार में वह वस्तु ऊंचे दामों पर बेची जाती है और उसके बेचने से प्राप्त होने वाला अतिरिक्त धन पूंजीपति की जेब में जाता है। पूंजीपति द्वारा बिना श्रम के प्राप्त यह पूंजी अतिरिक्त मूल्य है।

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