समानता के प्रकार | समानता के विभिन्न आयाम

इस आर्टिकल में राजनीतिक संकल्पना समानता के प्रकार, समानता से संबंधित अवधारणाएं, समानता के रूप – नकारात्मक और सकारात्मक समानता, समानता के विभिन्न आयाम, समानता के तत्व आदि टॉपिक पर चर्चा की गई है।

समानता के विभिन्न आयाम

समानता की उदारवादी (Liberalism) अवधारणा

समानता (Equality) के उदारवादी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व लास्की ने किया। लास्की (Laski) के अनुसार, “जब तक मनुष्य अपनी अपेक्षा योग्यता तथा आवश्यकताओं में असमान है, व्यवहार की असमानता असंभव है।”

समानता की उदारवादी अवधारणा नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए चयन के उपाय के रूप में प्रतिस्पर्धा का सिद्धांत (Theory of Compitition) सर्वाधिक न्यायोचित और कारगर मानते हैं।

उदारवादियों के अनुसार प्रतिस्पर्धा खुली और स्वतंत्र होनी चाहिए। संसाधनों और लाभांश के वितरण में भी प्रतिद्वंदिता के सिद्धांत को लागू करते हैं।

उदारवादी न्यूनतम जीवन स्तर और समान अवसर सुनिश्चित करने हेतु राज्य का हस्तक्षेप आवश्यक मानते हैं। राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक असमानता को आपस में जुड़ी हुई नहीं मानते हैं। हर क्षेत्र की समस्या का निराकरण ठोस तरीके से करना चाहते हैं।

ये उन्ही असमानता को मानते हैं जो लोगों को उनकी वैयक्तिक क्षमताएं विकसित करने से रोकती है। राजनीतिक, सामाजिक तथा कानूनी स्वतंत्रता को आवश्यक बताया। आर्थिक समानता (Economy Equality) की बात तक नहीं की है।

समानता की समाजवादी (Socialism) अवधारणा

समाजवाद का जन्म औद्योगिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विरोध में हुआ।

समाजवाद का मुख्य सरोकार वर्तमान असमानताओं को न्यूनतम करना और संसाधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा है। बुनियादी क्षेत्रों में सरकारी नियमन, नियोजन और नियंत्रण का समर्थन करते हैं।

भारत के प्रमुख समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया ने 5 तरह की असमानताओं की पहचान कि जिनके खिलाफ एक साथ लड़ना होगा। यह निम्न है –

  1. स्त्री पुरुष असमानता
  2. चमड़ी के रंग पर आधारित असमानता
  3. जातिगत असमानता
  4. औपनिवेशिक शासन और
  5. आर्थिक असमानता

बाद में इनमें दो को और शामिल किया गया है –

  1. व्यक्तिगत जीवन पर अन्यायपूर्ण अतिक्रमण के खिलाफ नागरिक स्वतंत्रता के लिए क्रांति
  2. अहिंसा के लिए सत्याग्रह के पक्ष में शस्त्र त्याग के लिए क्रांति।

यही सप्तक्रांति (Seven Revolutions) थी, जो लोहिया के अनुसार समाजवाद (Socialism) का आदर्श है।

समानता की मार्क्सवादी (Marxism) अवधारणा

मार्क्स के अनुसार खाईनुमा असमानता का बुनियादी कारण महत्वपूर्ण आर्थिक संसाधनों तथा संपत्ति का निजी स्वामित्व है।

मार्क्सवादी समानता स्थापित करने के लिए आवश्यक संसाधनों और अन्य तरह की संपत्ति पर जनता का नियंत्रण चाहते हैं। संघर्ष की अवधारणा पर आधारित है। इसके अनुसार व्यक्तिगत संपत्ति (Personal Property) का उदय, असमानता को जन्म देती है।

मार्क्सवादी दर्शन का एकमात्र उद्देश्य है, असमानता के कारको, विशेषाधिकारों तथा परस्थिति संबंधी अंतरों को स्पष्ट एवं नष्ट करना।

मार्क्सवादी पूंजीवादी समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता (Economy Equality) को समाप्त करके वर्ग विहीन व राज्य विहीन समाज की स्थापना करना चाहते थे। इस समाज में सामाजिक आर्थिक समानता हेतु सुप्रसिद्ध साम्यवादी नारा था “प्रत्येक को उसकी क्षमता के अनुसार प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार।”

समानता के दो रूप : नकारात्मक समानता और सकारात्मक समानता

नकारात्मक समानता (Negetive Equality)

नकारात्मक समानता से तात्पर्य है कि किसी वर्ग विशेष को विशेष सुविधाएं न प्राप्त हो तथा विकास की सुविधाएं उपलब्ध कराने में किसी प्रकार का विभेद न किया जाए। लास्की के अनुसार, “जो अधिकार किसी अन्य व्यक्ति को नागरिक होने के नाते प्राप्त हैं वही अधिकार समान मात्रा में मुझे भी प्राप्त होना चाहिए।”

समानता का अर्थ उन विषमताओं को दूर करना है जो नैसर्गिक नहीं है और समान अवसर के अभाव में उत्पन्न हो गई है।

सकारात्मक समानता (Positive Equality)

सकारात्मक समानता से तात्पर्य यह है कि राज्य के सभी व्यक्तियों के अपने विकास के समान अवसर प्राप्त हो। प्राकृतिक असमानताओं (Natural Inequality) को स्वीकार करते हुए सामाजिक विषमताओं को दूर करने का प्रयत्न किया जाए। समानता का वास्तविक रूप सकारात्मक है।

समानता के प्रकार (Types of Equality)

  1. राजनीतिक समानता (Political Equality)
  2. सामाजिक समानता (Social Equality)
  3. प्राकृतिक समानता (Natural Equality)
  4. नागरिक समानता अथवा कानूनी समानता (Civil Equality)
  5. आर्थिक समानता (Economy Equality)

(1) राजनीतिक समानता क्या है

बिना भेदभाव मताधिकार एवं राजनीतिक पद प्राप्त करना राजनीतिक समानता है। न्यायपूर्ण और समतावादी समाज के गठन के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक समानता बहुत आवश्यक है।

(2) सामाजिक समानता क्या है

सामाजिक समानता से तात्पर्य समाज में विशेषाधिकारों का अंत है। जाति, भाषा, धर्म, वर्ण, जन्म, लिंग तथा क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया हो।

भारत में समान अवसरों के मद्देनजर एक विशेष समस्या सुविधाओं की कमी नहीं बल्कि सामाजिक रीति-रिवाज है।

UNO घोषणा पत्र 1948 (UN Universal Declaration of Human Rights) में सामाजिक समानता पर बल दिया गया है।

(3) प्राकृतिक समानता क्या है

प्राकृतिक समानता से तात्पर्य यह है कि मनुष्य जन्मतः समान होता है अर्थात प्रकृति ने सभी को समान बनाया है। असमानता कृत्रिम है और समाज की देन है।

पोलिबियस, सिसरो, हाब्स, लॉक, रूसो, मार्क्स आदी विचारको ने प्राकृतिक समानता (Natural Equality) का समर्थन किया।

वर्तमान समय में प्राकृतिक समानता की विचारधारा सर्वथा भ्रममूल्क है। मनुष्य असमान ही जन्म लेता है। मनुष्य में भेद प्रकृति प्रदत्त है। अतः प्राकृतिक समानता मात्र काल्पनिक व्याख्या प्रतीत होती है। प्रजातंत्र के अभीजनवाद सिद्धांत के प्रवक्ता मानते हैं कि प्राकृतिक असमानता संभव है।

(4) कानूनी या नागरिक समानता का क्या अर्थ है

नागरिक समानता से प्राय: दो अर्थ लिए जाते हैं – कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण। प्रथम राज्य के कानूनों की दृष्टि में समस्त मनुष्य समान हो, द्वितीय राज्य के कानून द्वारा दंड या सुविधा प्रदान करने में व्यक्ति व्यक्ति में कोई भेद नहीं किया जाना चाहिए।

डायसी के अनुसार कानून के समक्ष समानता का वर्णन इस प्रकार है, “हमारे देश में प्रत्येक अधिकारी चाहे वह प्रधानमंत्री हो अथवा पुलिस का सिपाही अथवा कर वसूल करने वाला गैर कानूनी कार्य के लिए उतना ही दोषी माना जाएगा जितना एक साधारण नागरिक।”

रूसो ने ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ (Social Contract) नामक अपनी पुस्तक में लिखा था कि सभी नागरिकों को कानूनी समानता प्रदान करना नागरिक समाज की प्रमुख विशेषता है।

(5) आर्थिक समानता क्या है

आर्थिक समानता का अर्थ है कि समाज में उत्पादन और संपत्ति का न्यायोचित वितरण हो जिससे समाज के किसी एक वर्ग के हाथ में सारी संपत्ति एकत्र न हो जाए। आर्थिक समानता मार्क्सवादी विचारधारा की देन है और यह समाजवादी पद्धति की आधारशिला है।

व्यक्तियों की आय में इतना अधिक अंतर नहीं होना चाहिए कि धन के बल पर दूसरे व्यक्ति के जीवन पर अधिकार कर ले। अर्थात् धन के उचित वितरण पर बल दिया गया है।

आर्थिक समानता के अभाव में राजनीतिक और सामाजिक समानता का कोई मूल्य नहीं है।

रूसो के ‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ में ठीक ही कहा गया है कि सरकार की नीति ऐसी होनी चाहिए कि न तो यह अमीरों की संख्या बढ़ने दें और न भिख मंगों की।”

CME जोड, “आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता एक भ्रम है।”

समानता और न्याय में संबंध (Equality and Justice)

न्याय, कानून के समक्ष समानता के आदर्श पर आधारित हैं। दोनों का ही आधार निष्पक्षता है तथा बिना भेदभाव के समान अधिकार दिए जाने का समर्थन करती है।

समानता और स्वतंत्रता : पूरक (Equality and Liberty)

समानता और स्वतंत्रता को पूरक मानने वाले समर्थक हंटिंगटन, मैटलैंड, हृयूम, गॉडविन, रूसो, बार्कर, लास्की, पोलार्ड, सी ई एम जोड आदि है।

लास्की, “जहां कुछ लोग शिक्षित और अशिक्षित तथा अमीर और गरीब होते हैं हम सदा स्वामी और दासों का संबंध पाते हैं।”

CME जोड, “स्वतंत्रता का सिद्धांत जिसका राजनीति में मूल्य नहीं आंका जा सकता अत्यंत विनाशकारी सिद्ध हुआ जब उसे आर्थिक क्षेत्र में लागू किया गया।”

पोलार्ड, “स्वतंत्रता की समस्या का एक ही समाधान है और वह है समानता।”

लास्की, “बिना कुछ समानता की स्वतंत्रता छीछली होगी और स्वतंत्रता के बिना समानता निरर्थक होगी।”

स्वतंत्रता और समानता : परस्पर विरोधी धारणाएं

स्वतंत्रता और समानता को परस्पर विरोधी धारणाएं मानने वाले विचारक एक्टन, राम्यावेली, फ्रीडमैन, मिचेल्स, परेटो आदि है।

लार्ड एक्टन (Lord Acton) के अनुसार, “समानता की उत्कृष्ट अभिलाषा के कारण स्वतंत्रता की आशा ही व्यर्थ हो गई।”

समकालीन अंग्रेज दार्शनिक आइजिया बर्लिन ने भी स्वतंत्रता को केंद्रीय मूल्य मानते हुए समानता के दावे को पीछे धकेल दिया।

समानता के तत्व (Elements of Equality)

ब्रार्यन टर्नर ने अपनी पुस्तक ‘इक्वेलिटी’ में चार तत्वों की तरफ ध्यान दिया हैं :

  1. मौलिक समानता
  2. अवसर की समानता
  3. परिस्थितियों की समानता
  4. परिणामों की समानता

समानता स्थापित करने हेतु उपाय

औपचारिक समानता (Formal Equality) की स्थापना – निषेध या विशेषाधिकारों का अंत किया जाना।

विभेदक बरताव द्वारा समानता – विकलांगों हेतु रेंप तथा रात्रि में महिला की विशेष सुरक्षा की मांग।

सकारात्मक कार्यवाही (Positive Action) द्वारा समानता – आरक्षण द्वारा।

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समानता का अर्थ एवं परिभाषाएं

समानता के सिद्धांत

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. नारीवाद के अनुसार स्त्री-पुरुष असमानता किसका परिणाम है ?

    उत्तर : नारीवाद के अनुसार स्त्री-पुरुष असमानता पितृसत्ता का परिणाम है।

  2. अनुपातिक समानता क्या है ?

    उत्तर : अनुपातिक समानता का सिद्धांत अरस्तु ने दिया जिसका अर्थ ‘समकक्षों के मध्य समानता’ है।

  3. स्वतंत्रता और समानता को परस्पर विरोधी धारणाएं मानते हैं ?

    उत्तर : एक्टन, राम्यावेली, फ्रीडमैन, मिचेल्स, परेटो आदि स्वतंत्रता और समानता को परस्पर विरोधी धारणाएं मानते हैं।

  4. प्राकृतिक समानता का अर्थ क्या है ?

    उत्तर : प्राकृतिक समानता से तात्पर्य यह है कि मनुष्य जन्मतः समान होता है अर्थात प्रकृति ने सभी को समान बनाया है। असमानता कृत्रिम है और समाज की देन है।

My name is Mahendra Kumar and I do teaching work. I am interested in studying and teaching competitive exams. My qualification is B.A., B.Ed., M.A. (Pol.Sc.), M.A. (Hindi).

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