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प्लेटो का न्याय सिद्धांत क्या है | Plato Justice Theory in Hindi

• प्लेटो के न्याय संबंधी विचार

Plato's views on justice in hindi
प्लेटो की पुस्तक 'रिपब्लिक' जिसका शाब्दिक अर्थ 'गणराज्य' भी होता है परंतु प्लेटो की इस सर्वोत्कृष्ट रचना को इस अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए कि इस रचना में प्लेटो केवल राज्य या गणराज्य विषयक बातों का ही विवेचन करता है। इस ग्रंथ का नाम 'न्याय का विषय' (Concerning Justice) भी रखा गया है। ग्रंथ के संवाद 'न्याय' शब्द के विवेचन से प्रारंभ होता है। संवाद के पात्र सुकरात, थ्रेसिमेक्स, सेफाल्स, ग्लॉकन, पोलीमारकस आदि है। वाद-विवाद न्याय शब्द की व्याख्या पर चलता है।
  'न्याय क्या है' इस संबंध में जो विभिन्न दृष्टिकोण पात्रों द्वारा व्यक्त किए गए थे उनका समाधान सुकरात के मुख से करवाया गया है और जो निष्कर्ष अंत में निकाला गया वहीं प्लेटो का न्याय संबंधी सिद्धांत है। रिपब्लिक ग्रंंथ मनोवैज्ञानिक शैली में लिखा गया है।

Plato ka nyay Siddhant, Plato Justice Theory in hindi
Plato Justice Theory
 
प्लेटो से पूर्व प्राचीन ग्रीस में न्याय के मुख्यतः तीन सिद्धांत प्रचलित थे। प्लेटो ने न्याय के संबंध में अपने दृष्टिकोण को व्यक्त करने से पूर्व इन तीनों सिद्धांतों का खंडन किया।
 पहला परंपरावादी सिद्धांत था जिसकी अभिव्यक्ति रिपब्लिक में सेफाल्स और पोलीमारकस के द्वारा हुई थी। दूसरा सिद्धांत थ्रेसीमैक्स का था जो क्रांतिकारी सिद्धांत के नाम से जाना जाता था और तीसरा अनुभववादी सिद्धांत ग्लॉकन का था। यहां इन तीनों सिद्धांतों की प्लेटो द्वारा की गई विवेचना अपेक्षित है।

न्याय के संबंध में भ्रामक मान्यताएं

1. परंपरावादी सिद्धांत (Traditionalist theory)
 इस सिद्धांत के प्रथम प्रतिपादक सेफाल्स का कहना था कि सत्य बोलना तथा अपना ऋण चुकाना ही न्याय है। सेफाल्स के पुत्र पॉलीमारकस ने इस सिद्धांत की व्याख्या करते हुए कहां की मित्रों के साथ भला करना तथा शत्रुओं को हानि पहुंचाना न्याय है।
प्लेटो ने इन दोनों स्थापनाओं का खंडन किया है। उसने कहा कि न्याय केवल सत्य बोलने में अथवा अपने ऋण को चुकाने मात्र में निहित नहीं है। कभी-कभी शासकों के लिए राज्य के न्यायपूर्ण हितों को ध्यान में रखकर असत्य भी बोलना होता है जिसे किसी भी दृष्टि से अन्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता।
कभी-कभी आर्थिक दृष्टि से वंचित व्यक्ति के लिए अपने ऋणों को चुकाने से इंकार कर देना भी न्यायपूर्ण होता है।
 इसी प्रकार प्लेटो को पोलीमारकस की यह बात भी मान्य नहीं है कि मित्र के साथ भलाई करना तथा शत्रु के साथ बुरा करना न्याय है। 'दांत के बदले दांत और आंख के बदले आंख की नीति' का अनुसरण करना न्याय नहीं है।
 न्यायप्रिय व्यक्ति किसी के प्रति भी बुरा करने की बात नहीं सोचता। इसके अतिरिक्त मित्र और शत्रु के बीच भेद करने की भी कोई सुनिश्चित कसौटी नहीं है। न्याय एक अपरिवर्तनीय एवं अनुलंघनीय सद्गुण है जिसे नीति अथवा कला का पर्यायवाची नहीं माना जा सकता।
2. क्रांतिकारी सिद्धांत (Revolutionary theory)
 थ्रेसिमैक्स ने अपन क्रांतिकारीे सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए न्याय को 'शक्तिशाली का हित' (Justice is the interest of the stronger) घोषित किया। थ्रेसीमैक्स का तर्क था कि न्याय शक्तिशाली का प्राकृतिक अधिकार है।
 शक्तिशाली का शासन करने का अधिकार स्वयंसिद्ध है, सामाजिक एवं राजनीतिक न्याय उस व्यक्ति के आदेश अथवा हितों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है जो शक्तिशाली है।
 प्लेटो को यह तर्क मान्य नहीं है। उसका कहना है कि शासक आवश्यक रूप से सबसे अधिक शक्तिशाली नहीं होता।
 यदि न्याय शासक का हित है तो न्यायप्रिय व्यक्ति वह है जो शासक के आदेशों का पालन करता है। परंतु वह व्यक्ति शासक से अधिक शक्तिशाली है अथवा वह किसी प्रकार शासक की अपेक्षा अधिक शक्ति संगठित कर ले तो उस स्थिति में उसके लिए शासक के आदेशों का उल्लघंन करना न्याय पूर्ण होगा। कई बार ऐसा देखा गया है कि वे सरकारी जो केवल शक्ति के बल पर शासन करती है सबसे अधिक दुर्बल सरकारें सिद्ध हुई है। सरकार केवल वही टिकाऊ रही है जो शासितों के प्रति भला करती हो।
3. अनुभववादी सिद्धांत (Empirical theory)
 इसके प्रतिपादक ग्लॉकन ने न्याय को 'दुर्बल के हित' के रूप में परिभाषित किया। अपनी इस मान्यता की व्याख्या करते हुए ग्लॉकन ने समाज के ऐतिहासिक विकास का एक चित्र प्रस्तुत किया है और कहा है कि न्याय की अवधारणा का उदय इसलिए हुआ था कि दुर्बलोंं के हितों की रक्षा की जा सके।
ग्लॉकन ने निष्कर्ष निकाला कि 'न्याय कृत्रिम है', वह 'संविदा का परिणाम' है तथा 'भय का आत्मज (शिशु)' है। मनुष्य का नैसर्गिक स्वार्थ न्याय के कृत्रिम बंधनों से जकड़ जाता है, अतः न्याय बहुसंख्यक दुर्बलों का सशक्त अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हित हैं। ग्लॉकन ने न्याय को 'कमजोर की आवश्यकता' की संज्ञा दी है।
प्लेटो को यह सिद्धांत भी मान्य नहीं है।
 उनका मानना है कि न्याय कोई संविदाजन्य अथवा कृत्रिम अवधारणा नहीं है, अपितु वह मनुष्य का आंतरिक गुण है। उसने कहा कि ग्लॉकन के अनुसार संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता जो स्वेच्छा से न्यायपूर्ण आचरण करना चाहे, यदि दुर्बल न्याय के अनुसार आचरण करते हैं तो वह केवल इसलिए क्योंकि उन्हें सशक्तों पर अन्याय करने की क्षमता नहीं है। इसी प्रकार शक्तिशाली भी न्याय के अनुसार आचरण करने के लिए कानून की उपस्थिति के कारण बाध्य हैं।
सेफालस, पॉलीमारकस, थ्रेसीमैक्स, ग्लॉकन न्याय को बाह्या वस्तु मानते हैं। प्लेटो न्याय को आत्मा के अंदर की वस्तु मानता है और इसी आधार से इन तीनों दृष्टिकोणों को अस्वीकार कर देता है। प्लेटो के मतानुसार, "न्याय मानव आत्मा की उचित अवस्था और मानवीय स्वभाव की प्राकृतिक मांग है।"

प्लेटो के अनुसार न्याय क्या है ?

What is justice according to Plato ?
प्लेटो के अनुसार न्याय का अर्थ केवल इतना ही है कि मनुष्य अपने उन सब कर्तव्यों का पूरा पालन करें, जिसका पालन समाज के प्रयोजन की दृष्टि से किया जाना आवश्यक है।
 न्याय शब्द के अंतर्गत सामान्यतया मानव के नैतिक जीवन तथा उसके समस्त कर्तव्यों का समावेश है। ई. एम. फॉस्टर के शब्दों में, "जिसे हम नैतिकता कहते हैं वही प्लेटो के लिए न्याय है।"
1. न्याय शक्तिशाली का हित नहीं
 न्याय की विभिन्न परंपरागत धाराओं का समाधान करते हुए प्लेटो न्याय की पारिभाषिक व्याख्या करता है। उसके मत से न्याय शक्तिशाली का हित नहीं हो सकता।
 उसके अनुसार शासक उन गडरियों की भांती है जो अपनी भेड़ों की रक्षा में लगे हो। उनका अस्तित्व शासितों के हित में शासन करने में निहित है। सता एक प्रकार की न्यास है (Power is a trust) इसका दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
2. न्याय चार मानवीय सद्गुणों में से एक
 प्लेटो के मत से न्याय मानवीय सद्गुणों का अंग है। कीसी व्यक्ति में सद्गुणों का अस्तित्व वह विशेषता है जो उसे एक मानव बनाती है और इसे उत्तमता प्रदान करती है। मानवीय सद्गुण वह है जो किसी मानव को श्रेष्ठ मानव बनाता है।
 प्लेटो के मत से मानवीय सद्गुण में चार तत्व विद्यमान रहते हैं - बुद्धि या विवेक, साहस, निग्रह या आत्म-संयम तथा न्याय।
प्लेटो के न्याय संबंधी विचार
3. न्याय राजनीतिक समाज के संगठन का मुख्य तत्व
 प्लेटो के अनुसार न्याय केवल माननीय सद्गुणों का एक अंग मात्र नहीं है। यह मानवों में वह गुण है जो उन्हें एक दूसरे के मध्य राजनीतिक संबंध स्थापित करने की क्षमता प्रदान करता है, जिसके कारण राजनीतिक समाजों का निर्माण होता है।
बुद्धि या विवेक राज्य के शासकों का सद्गुण है, उत्साह सैनिक वर्ग का गुण है तथा आत्म संयम उत्पादक वर्ग का। इन तीनों तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले वर्ग जब अपने-अपने निर्दिष्ट क्षेत्रों में कार्य करते हुए एक दूसरे के हित में कार्य करने की भावना रखते हैं तो वहीं सामाजिक न्याय है।
 ऐसी भावना से संगठित समाज आदर्श राज्य बनता है। इसी प्रकार मानवीय सद्गुण एवं राज्य के सद्गुण समान तत्वों से युक्त है।
 4. प्रत्येक व्यक्ति का नैसर्गिक योग्यता के अनुसार निर्दिष्ट कार्य में लगे रहना ही न्याय
 प्लेटो के मत में न्याय वैयक्तिक एवं सार्वजनिक सद्गुण है, क्योंकि यह व्यक्ति एवं राज्य दोनों की उच्चतम अच्छाई को बनाए रखता है।
5. न्याय पर आधारित व्यवस्था व्यक्ति में कर्तव्य की भावना को प्रेरित करती है
 राज्य में प्रत्येक व्यक्ति अपने निर्धारित कर्तव्यों को संपन्न करें और दूसरों के क्षेत्र में प्रविष्ट न हो। अतः न्याय का निवास स्थान प्रत्येक नागरिक की अंतरात्मा में है जिसके अनुसार वह अपने निर्दिष्ट स्थान पर अपना कर्तव्य करता है।
 राज्य के संबंध में न्याय का अर्थ है नागरिकों में कर्तव्यों की भावना का होना। यह भावना मनुष्यों को सामाजिक बनाती है।
 प्लेटो की यह प्रसिद्ध उक्ति है कि, "राज्य ओक के वृक्ष या चट्टान से उत्पन्न नहीं होते, अपितु उनका उद्गम स्त्रोत उसमें निवास करने वाले व्यक्तियों के आचरण है।"
6. प्लेटो की न्याय संबंधी धारणा वैधानिक नहीं वरन नैतिक और सर्वव्यापी है। न्याय सिद्धांत कार्यों के विशिष्टीकरण का प्रतिपादक है।
7. प्लेटो के न्याय सिद्धांत में 'व्यक्ति बनाम राज्य' जैसी कोई चीज नहीं। इसमें व्यक्ति राज्य के लिए है ; राज्य के प्रति उसके कर्तव्य ही है, अधिकार नहीं ; राज्य साध्य है व्यक्ति साधन। प्लेटो के अनुसार नागरिकों में कर्तव्य भावना ही राज्य का न्याय सिद्धांत है।
8. प्लेटो के अनुसार न्याय की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि राज्य की शासन व्यवस्था विवेकशील, नि:स्वार्थी और कर्तव्यपरायण व्यक्तियों के हाथों में हो।
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प्लेटो के न्याय सिद्धांत की आलोचना

Criticism of Plato's theory of justice
1. प्लेटो का न्याय सिद्धांत व्यक्ति को पूर्णतया राज्य के अधीन कर देता है।
2. प्लेटो का न्याय सिद्धांत नैतिक सिद्धांतों पर आधारित है। लेकिन कानूनी शक्ति के अभाव में यह निष्क्रिय सिद्धांत है।
3. प्लेटो का न्याय सिद्धांत व्यक्तियों में उत्पन्न होने वाले स्वभाविक संघर्षों का कोई समाधान नहीं करता।
4. प्लेटो के न्याय सिद्धांत के अनुसार राज्य के तीन अंग एक दूसरे के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करते। किंतु व्यवहार में हम पाते हैं कि प्रतिनिधि दार्शनिक शासक बाकी दो वर्गों - सैनिक तथा उत्पादन वर्ग के कामों में हस्तक्षेप ही नहीं कठोर नियंत्रण भी रखता है।
5. प्लेटो का न्याय सिद्धांत अप्रजातांत्रिक है। इसमें एक वर्ग का राजनीतिक शक्ति पर एकाधिकार है जो अल्पसंख्यक है जबकि दूसरे वर्ग को, जो बहुसंख्यक है उससे वंचित रखा गया है।
6. प्लेटो के न्याय सिद्धांत में सर्वाधिकारवादी (Totalitarian) राज्य के अंकुर छिपे हुए हैं। प्लेटो के न्याय सिद्धांत में फासीवाद के बीज भी दृष्टिगोचर होते हैं। न्याय सिद्धांत असमानता का समर्थन करता है, प्रजातंत्र का विरोधी है, मानवाधिकारों की उपेक्षा कर सिर्फ कर्तव्यों पर जोर देता है और शासन कार्य कुछ श्रेष्ठ व्यक्तियों के हाथों में सौंपता है।
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सारांश (Summary)
प्लेटो का न्याय सिद्धांत (Justice theory of Plato) आदर्श राज्य की आधारशिला है। प्लेटो के अनुसार न्याय के दो रूप हैं - व्यक्तिगत और सामाजिक। वह मानवीय आत्मा (व्यक्ति) में तीन तत्व या नैसर्गिक प्रवृतियां मानता है - १. इंद्रिय तृष्णा या वासना २. शौर्य या साहस ३. बुद्धि या ज्ञान। ये तीनों गुण जब उचित अनुपात में मानव मस्तिष्क में विद्यमान रहते हैं, तभी व्यक्ति न्याय का पालन कर सकता है।
 ये तीनों तत्व प्लेटो के दर्शन के प्रमुख आधार है और इसी के आधार पर उसने राज्य को उत्पन्न करने वाले तीन तत्वों का तथा राज्य का निर्माण करने वाले तीन वर्गों का प्रतिपादन किया है।
 प्लेटो के अनुसार जिस प्रकार छोटे अक्षरों की तुलना में बड़े अक्षर आसानी से पढ़े जा सकते हैं उसी प्रकार व्यक्ति के जीवन की अपेक्षा राज्य में न्याय को स्पष्ट रूप से लक्षित किया जा सकता है।
 प्लेटो ने नैतिकता और सदाचरण को प्रतिष्ठित करने के लिए तथा तत्कालीन राज्य और सामाजिक व्यवस्था की कुरीतियों को दूर करने के लिए प्लेटो (Plato) ने श्रेष्ठ तर्कों के आधार पर न्याय के विचार को प्रतिपादित किया।
 प्लेटो का न्याय स्वधर्म का सिद्धांत है, सदाचार का सिद्धांत है, जो कानूनी न्याय की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक है।

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My name is Mahendra Kumar and I do teaching work. I am interested in studying and teaching competitive exams. My qualification is B.A., B.Ed., M.A. (Pol.Sc.), M.A. (Hindi).

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