मूल अधिकारों का वर्गीकरण

इस आर्टिकल में भारतीय संविधान के भाग-3 में वर्णित मूल अधिकारों का वर्गीकरण किया गया है। साथ ही मूल अधिकार क्या होते हैं, मूल अधिकारों की विशेषताएं, मूल अधिकारों से संबंधित न्यायिक निर्णय के बारे में चर्चा की गई है।

भारत में मूल अधिकारों से संबंधित प्रावधान

मूल अधिकार भारतीय संविधान के भाग 3 के अनुच्छेद 12 से 30 तक तथा अनुुुच्छेद 32 से 35 तक कुल 23 अनुच्छेद में मूल अधिकारों का विस्तृत विवेचन है। भाग-3 को भारत का अधिकार पत्र या मैग्नाकार्टा कहा जाता है।

भारत में मौलिक अधिकारों की सर्वप्रथम मांग 1895 के संविधान विधेयक द्वारा की गई। 1928 में मोतीलाल नेहरू द्वारा दिए गए नेहरू प्रतिवेदन में भारतीयों को मूल अधिकार प्रदान करने की मांग की गई।

संविधान निर्माण के दौरान जे बी कृपलानी की अध्यक्षता में गठित मूल अधिकार एवं अल्पसंख्यक उप समिति ने परामर्श समिति की अनुशंसाओं के आधार पर मूल अधिकारों को संविधान में शामिल किया गया।

मूल संविधान में 7 अधिकार थे। अनुच्छेद 19 (च) में वर्णित संपत्ति के अधिकार (स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत वर्णित था) को 44 वें संविधान संशोधन 1978 के द्वारा समाप्त कर विधिक अधिकार (अनु. 300 A, भाग 12, अध्याय 4) बना दिया गया। अत: अब 6 मूल अधिकार है।

भारतीय संविधान में वर्णित मूल अधिकारों की विशेषताएं

  • मूल अधिकार पूर्णत: निरपेक्ष (Absolute) नहीं है। जनहित में युक्तियुक्त निर्बन्धन लगाये जा सकते हैं। निर्बन्धन युक्तियुक्त है या नहीं इसका निर्णय न्यायालय द्वारा किया जाता है। आत्यन्तिक नहीं है।
  • मूल अधिकारों का निलम्बन किया जा सकता है, परंतु संविधान से निकाला नहीं जा सकता।
  • मूल अधिकार व्यवस्थापिका तथा कार्यपालिका पर सीमाएं आरोपित करते हैं।
  • मूल अधिकार त्याज्य नहीं है।
  • ग्लैडहिल : मूल अधिकार राज्य के लिए कुछ निषेधाज्ञाएं हैं।
  • मूल अधिकार भारत के नागरिकों एवं गैर नागरिकों के लिए अलग-अलग हैं। भारत के नागरिकों के लिए सभी मूल अधिकार प्राप्त है। गैर नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति तथा सांस्कृतिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
  • मूल अधिकारों का उद्देश्य सरकार की शक्तियों को सीमित कर व्यक्तियों के हितों में वृद्धि करना था। राजनीतिक प्रजातंत्र की स्थापना करना (अनु.31)।
  • मूल अधिकार प्रवर्तन योग्य है। उच्चतम एवं उच्च न्यायालय द्वारा प्रवर्तन की व्यवस्था अनुच्छेद 32 में की गई है।
  • मूल अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता। इसका अल्पीकरण करने वाली विधियां अल्पीकरण की सीमा तक शून्य होगी।
  • मूल अधिकारों पर युक्तियुक्त निर्बंधन आरोपित किए जा सकते हैं जिनके संबंध में अनुच्छेद 19 (2) से (6) में प्रावधान किया गया है।
  • मूल अधिकारों को अमेरिकी संविधान (American Constitution) से ग्रहण किया गया है।

नकारात्मक एवं सकारात्मक भूमिका वाले अधिकारों का वर्गीकरण

सकारात्मक भूमिका वाले मूल अधिकार – धर्म के मानने, आचरण एवं प्रसार तथा अंत:करण की स्वतंत्रता।

  • अनुच्छेद 29 (1) विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति बनाए रखने का अधिकार।
  • अनुच्छेद 30 (1) धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्था की स्थापना एवं प्रशासन का अधिकार।

नकारात्मक भूमिका वाले मूल अधिकार –

  • विधि के समक्ष समानता से वंचित नही (अनुच्छेद 14)।
  • धर्म, वंश, जाति, लिगं, जन्म स्थान के आधार पर भेद नहीं {अनुच्छेद 15 (1)}।
  • लोक नियोजन में विभेद नहीं अनुच्छेद {16 (2)}।
  • सेना या विधि के सिवाय कोई उपाधि नहीं {अनुच्छेद 18 (1)}।
  • अपराधों के दोष सिद्ध में सरंक्षण (अनुच्छेद 20)।
  • बंदीकरण एवं निरोध में सरंक्षण {अनुच्छेद 22 (1)}।
  • पूर्णत: राज्य निधि से पोषित संस्थान में धार्मिक शिक्षा नहींं {अनुच्छेद 28 (1)}।

विधि के समक्ष समानता अनुच्छेद 14 में दो प्रकार के अधिकारों का उल्लेख है –

  • विधि के समक्ष समानता – ब्रिटेन की सामान्य विधि से ग्रहण।
  • कानून का समान संरक्षण (Equal Protection of the Law) – समान परिस्थितियों में समान व्यवहार।

मूल अधिकारों का निलंबन (Suspension)

  • सेना विधि लागू होने की स्थिति में – अनुच्छेद 34
  • आपातकाल में – अनुच्छेद 358 एवं 359
  • संविधान संशोधन द्वारा – अनुच्छेद 368
  • सशस्त्र बलों का मौलिक अधिकार – अनुच्छेद 33 न्यायालय अमान्य नहीं कर सकता।
  • अनुच्छेद 33 मूल अधिकारों के उपांतरण की शक्ति निहित की गई है कि किस सीमा तक किन व्यक्तियों को मूल अधिकार प्राप्त होंगे। सिर्फ संसद ही कानून बना सकती है।
  • 44 वां संविधान संशोधन 1978 – अनुच्छेद 20 एवं 21 में अंतर्विष्ट मूल अधिकार को छोड़कर सभी राष्ट्रीय आपात के समय निलंबित हो जाते हैं। अनुच्छेद 19 में वर्णित वाक् स्वतंत्रता आदि विषयक अधिकार राष्ट्रीय आपात में स्वत: ही निलंबित हो जाते हैं जबकि अन्य राष्ट्रपति के आदेश से निलम्बित होते हैं।

मौलिक अधिकार संबंधी महत्वपूर्ण वाद एवं संशोधन

गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) – निर्णय – संविधान के किसी भी भाग में अनुच्छेद 368 तथा मौलिक अधिकार सहित संशोधन किया जा सकता है। बाद में संशोधन पर रोक लगा दी अर्थात् संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।

24 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1971 – अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 368 में संशोधन किया और अनुच्छेद 368 में व्यवस्था कि की मौलिक अधिकारों में संशोधन किया जा सकता है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973 मामले में संशोधन को विधि मान्यता दी और गोलकनाथ निर्णय को निरस्त कर दिया।

42 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1976 – अनुच्छेद 368 के खंड 4 और 5 जोड़कर यह व्यवस्था की कि संशोधन को न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता।

मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ 1980 – न्यायालय किसी भी संशोधन का पुनर्विलोकन कर सकता। 42वां संशोधन समाप्त ।

इंदिरा साहनी विवाद : मंडल आयोग द्वारा ओबीसी को दिए गए 27% आरक्षण के विरुद्ध वाद ; सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि ओबीसी वर्ग में सामाजिक रुप से सशक्त (क्रीमी लेयर) चिकनी मलाईदार परत को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए साथ ही आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% तय की।

विशाखावाद : अपने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से कामकाजी महिलाओं का सरंक्षण। मेनका गांधी वाद : अनुच्छेद 14, 19 और 21 परस्पर अपवर्जी नहीं है।

मूल अधिकारों का वर्गीकरण

(1) समता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)

  • विधि के समक्ष समता और विधि का समान संरक्षण (अनुच्छेद 14)
  • धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर विभेद प्रतिषेध (अनुच्छेद 15) : अनुच्छेद 15 (क) तथा 15 (4) के अनुसार सामाजिक उद्देश्यों के प्रवर्तन जैसे महिलाओं, बच्चों तथा पिछड़ी जातियों के कल्याण के लिए राज्य मूल अधिकारों में हस्तक्षेप कर सकता है।
  • लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता (अनुच्छेद 16)
  • अस्पृश्यता का अंत (अनुच्छेद 17) : अस्पृश्यता का अंत का अंत करने के लिए कानून बनाने का अधिकार संसद को अनुच्छेद 35 द्वारा दिया गया है।
  • उपाधियों का अंत (अनुच्छेद 18) : उपाधियों का अंत केवल निर्देशात्मक (Instructional) है आदेशात्मक (Imperatives) नहीं।

(2) स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद (19 से 22)

  • वाक् स्वतंत्रता आदि विषय कुछ अधिकारों का संरक्षण (अनुच्छेद 19) : भाषण एवं अभिव्यक्ति के अधिकार का प्रयोग भारत की सीमा के भीतर ही नहीं वरन विश्व के किसी भी देश की भूमि पर किया जा सकता है। इसे किसी भौगोलिक सीमा में बांधा नहीं जा सकता है।
  • Article 19 (क) वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत विज्ञापन एवं सिनेमा को प्रेस की स्वतंत्रता के अंतर्गत नहीं माना जा सकता।
  • अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण (अनुच्छेद 20) : अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण के अंतर्गत अपराध के समय लागू विधि से दंडित करने का प्रावधान है जिसे भूतलक्षी (Retrospective) दंड विधि कहा जाता है।
  • शिक्षा का अधिकार : मूल अधिकार – अनुच्छेद 21 (क) – 46 वां Constitutional Amendment 2001 द्वारा।
  • मेनका गांधी बनाम भारत संघ मामले में निर्णय अनुुुच्छेद 21 में प्रयुक्त “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” में नैसर्गिक/प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) निहित है। विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है।
  • प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण (अनुच्छेद 21)
  • कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण (अनुच्छेद 22) : निवारक निरोध/निवारक नजरबंदी – अनुच्छेद 22 (3) से (7) तक। उद्देश्य – अपराधी को अपराध करने से पूर्व ही रोकना। टाडा TADA तथा पोटा POTA कानून इसी के अंतर्गत बनाए गए हैं।

(3) शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)

  • मानव के साथ दुर्व्यवहार और बलात श्रम का निषेध (अनुच्छेद 23) : मानव के दुर्व्यापार एवं बलात श्रम का निषेध (अनुच्छेद 23) – संसद को अनुच्छेद 35 के अंतर्गत उक्त अनुच्छेद के उल्लंघन करने वाले के विरुद्ध कानून बनाकर दंड देने की व्यवस्था की शक्ति है।
  • कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध (अनुच्छेद 24) : कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध (अनुच्छेद 24) का राज्य नीति निर्देशक तत्व के अनुच्छेद 45 से सीधा संबंध है।

(4) धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)

  • अंतःकरण और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण, प्रचार की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25)
  • धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 26)
  • किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के बारे में संदाय की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 27)
  • कुछ शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 28)
  • धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28) सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन है।

(5) संस्कृति और शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 29-30)

  • अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण (अनुच्छेद 29)
  • शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार (अनुच्छेद 30)

(6) संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

मूल अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उपचार। डॉ भीमराव अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचारों का अधिकार को संविधान की आत्मा कहा है।

मूल अधिकारों के उल्लंघन के मामले में राज्य के विरुद्ध उपचार प्राप्त करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय Article 32 और उच्च न्यायालय Article 226 के अधीन रिट याचिका (Writ Petition) दाखिल करने का अधिकार नागरिकों को प्रदान किया गया है।

अनुच्छेद 32 के अधीन सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता संविधान का आधारभूत ढांचा है अतः इसे अनुच्छेद 368 के अधीन संशोधित कर नष्ट नहीं किया जा सकता जब तक केशवानंद भारती का निर्णय उल्ट नहीं दिया जाता।

न्यायालय द्वारा जारी रिट याचिका के प्रकार

  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) (अनुच्छेद21)
  2. गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश, सशरीर उपस्थित करना।
  3. परमादेश (Mandamus) : सार्वजनिक पदाधिकारी द्वारा संवैधानिक दायित्वों का पालन नहीं करने पर।
  4. निषेध आदेश : निचली अदालतों द्वारा अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करने से रोकने हेतु अधिकार।
  5. अधिकार पृच्छा : गैरकानूनी तरीके से पद पर नियुक्त पदाधिकारी को कार्य करने से रोकने हेतु।
  6. उत्प्रेषण (Certiorari) : निचली अदालत या सरकारी अधिकारी जब बिना अधिकार के कार्य करता है तब इस आदेश द्वारा ऊपरी अदालत या अधिकारी को स्थानांतरित करना।

रिट (Writ) जारी करने के मामले में उच्चतम और उच्च न्यायालय में अंतर

  • अनुच्छेद 32 उच्चतम न्यायालय केवल मौलिक अधिकारों के मामले में ही रिट जारी करता है परंतु उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत इसके अलावा कानूनी अधिकारों के मामले में भी जारी कर सकता है।
  • उच्चतम न्यायालय मूल अधिकार उल्लंघन मामले में सुनवाई से इनकार नहीं कर सकता परंतु उच्च न्यायालय इंकार कर सकता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय की रिट का प्रभाव क्षेत्र संपूर्ण भारत है तथा उच्च न्यायालय का संबंधित राज्य या अपने क्षेत्र के राज्य के मामले में ही कर सकता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. भारतीय संविधान में मूल अधिकार कहाँ से लिए गए हैं?

    उत्तर : भारतीय संविधान में मूल अधिकार संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है। मूल अधिकारों का वर्णन संविधान के भाग-3 में (अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35) है।

  2. कानून का समान संरक्षण शब्दावली कहाँ से लिया गया है?

    उत्तर : ‘कानून के समान संरक्षण’ को संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में 14 वें संशोधन से लिया गया है। यह मूल रूप से संविधान का एक खंड है जो 1868 में अमेरिका में पारित किया गया था।
    कानून के समक्ष समानता से अभिप्राय है कि राज्य का कानून या न्यायालय किसी व्यक्ति के साथ कोई विभेद नहीं करेगा, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, लिंग या वर्ण का हो। कानून की दृष्टि में सभी समान हैं। कानून के समक्ष समानता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 11 में कानून के समक्ष समानता के अधिकार की विवेचना की गई है।

  3. सामाजिक उपाधियों का निषेध किस मूल अधिकार से संबंधित है?

    उत्तर : सामाजिक उपाधियों का निषेध समानता के अधिकार से संबंधित है। समानता के अधिकार के तहत सामाजिक उपाधियों को समाप्त कर दिया गया है तथा शिक्षा क्षेत्र एवं सेना में व्यक्ति द्वारा स्वयं की योग्यता के द्वारा अर्जित उपाधियां ही दी जाएंगी।

  4. किस मूल अधिकार को भारतीय संविधान की आत्मा कहा गया है?

    उत्तर : संवैधानिक उपचारों के अधिकार (अनुच्छेद 32) को संविधान की आत्मा कहा गया है।

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