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उत्तर व्यवहारवाद क्या है

राजनीति विज्ञान के व्यवहारवाद की जहां कुछ अपनी उपयोगिताएं रही हैं, वहीं इसकी अनेक दुर्बलताएं भी हैं और इन दुर्बलताओं ने ही उत्तर व्यवहारवाद को जन्म दिया है। जब व्यवहारवादी आंदोलन अपनी सफलता के शिखर पर था तब अमेरिकी राजनीति विज्ञान में एक नए आंदोलन का सूत्रपात हुआ उसे ही उतर व्यवहारवाद कहा जाता है।

राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में, उत्तर व्यवहारवाद आंदोलन 1969 में डेविड ईस्टन के आह्वान से शुरू हुआ। उत्तर व्यवहारवाद में राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन के लिए वैज्ञानिक पद्धति के प्रयोग में कोई छूट नहीं दी जाती, परंतु मूल्यों के साथ फिर से सरोकार स्थापित करने का प्रयास किया जाता है।

डेविड ईस्टन जो कि व्यवहारवाद का एक प्रणेता रहा है, उसने 1960 में व्यवहारवाद पर प्रबल प्रहार किया। 1945 से 1960 के काल में अमेरिकी विश्वविद्यालयों में शोध और अध्ययन के क्षेत्र में प्राकृतिक विज्ञानों की पद्धति को अपनाकर राजनीति विज्ञान को कठोर वैज्ञानिक अनुशासन का रूप देने की चेष्टा की गई, लेकिन इसमें असफलता ही हाथ लगी। यह देखा गया कि व्यवहारवाद के कारण राजनीति विज्ञान राजनीतिक जीवन की वास्तविक समस्याओं से अलग हटकर अवधारणात्मक ढांचों, मॉडलों और सिद्धांतों में उलझ कर रह गया है।

1965 में अमरीकी राजनीति विज्ञान एसोसिएशन के 65 वें सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए अपने भाषण में तत्कालीन राजनीतिक अनुसंधान की स्थिति पर गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए डेविड ईस्टन ने “प्रासंगिकता एवं सक्रियता की लड़ाई के नारे” कहकर उतर व्यवहारवाद का पूरा समर्थन किया। डेविड ईस्टन ने राजनीति विज्ञान के परम्परागत दृष्टिकोण के प्रति व्यवहारवादी आंदोलन को विद्रोह बताया जबकि उतर व्यवहारवाद को व्यवहारवाद का सुधारात्मक और सहयोगी बताया।

उत्तर व्यवहारवाद, व्यवहारवाद का विरोधी आंदोलन न होकर सुधारात्मक आंदोलन था। यह व्यवहारवादियों द्वारा किए जाने वाले शोध तथा अध्ययन के प्रति गहरे असंतोष और परिणाम की प्रतिक्रिया थी।

उत्तर व्यवहारवाद में इस बात पर बल दिया गया है कि राजनीतिक शोध जीवन की समस्याओं से प्रासंगिक और उन पर आधारित होनी चाहिए। हमारा लक्ष्य सामाजिक स्थिरता नहीं वरन परिवर्तन होना चाहिए तथा मूल्यों को समस्त अध्ययन में केंद्रीय स्थिति प्रदान की जानी चाहिए। इस तरह उतर व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान को उपयोगी एवं प्रासंगिक बनाना चाहते थे।

उत्तर व्यवहारवादियों के अनुसार, “बौद्धिकता कि समाज में एक निश्चित और महत्वपूर्ण भूमिका है और ज्ञान का उपयोग जीवन के लिए किया जाना चाहिए।”

उत्तर व्यवहारवाद के उदय के प्रमुख कारण

  • व्यवहारवादियों द्वारा राजनीति विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञान बनाने की असफल कोशिश।
  • व्यवहारवादी मानव व्यवहार के निश्चित नियम देने में असफल।
  • व्यवहारवाद के द्वारा मूल्यों की उपेक्षा।
  • व्यवहारवाद की प्रासंगिकता व निष्क्रियता

निष्कर्ष (Conclusion) :

वर्तमान समय (1970 ईस्वी के बाद) में व्यवहारवादियों तथा उत्तर व्यवहारवादियों के बीच पारस्परिक विरोध की स्थिति समाप्त हो गई है। व्यवहारवाद की इस बात को भी स्वीकार कर लिया गया है कि राजनीति विज्ञान में अधिकाधिक मात्रा में आनुभविक अध्ययन और शुद्ध परिणाम देने वाली प्रविधियों को अपनाते हुए इसे सही अर्थों में विज्ञान की स्थिति प्रदान करने की चेष्टा की जानी चाहिए।

लेकिन इसके साथ ही यह मान लिया गया कि राजनीति का ज्ञान वास्तविक राजनीतिक जीवन की समस्याओं और जटिलताओं से अलग रहकर नहीं किया जा सकता तथा समस्त राजनीति का अध्यन के मूल्यों को केंद्रीय स्थिति प्राप्त होनी चाहिए। व्यवहारवादी, उत्तर व्यवहारवादी प्रवृत्तियों के बीच उचित समन्वय स्थापित करने पर ही राजनीति विज्ञान का अध्ययन वैज्ञानिकता और साथ ही सार्थकता की स्थिति को प्राप्त कर सकेगा।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

  1. उत्तर व्यवहारवाद कब शुरू किया गया था?

    उत्तर : राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में, उत्तर व्यवहारवाद आंदोलन 1969 में डेविड ईस्टन के आह्वान से शुरू हुआ।

  2. उत्तर व्यवहारवाद का जन्मदाता कौन है ?

    उत्तर : उत्तर व्यवहारवाद का जन्मदाता डेविड ईस्टन को माना जाता है। 1965 में अमरीकी राजनीति विज्ञान एसोसिएशन के 65 वें सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए अपने भाषण में तत्कालीन राजनीतिक अनुसंधान की स्थिति पर गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए डेविड ईस्टन ने “प्रासंगिकता एवं सक्रियता की लड़ाई के नारे” कहकर उतर व्यवहारवाद का पूरा समर्थन किया।

  3. उत्तर व्यवहारवाद के उदय के दो प्रमुख कारण बतलाइए?

    उत्तर : उत्तर व्यवहारवाद के उदय के दो प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं :
    1. व्यवहारवादियों द्वारा राजनीति विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञान बनाने की असफल कोशिश।
    2. व्यवहारवाद के द्वारा मूल्यों की उपेक्षा।

My name is Mahendra Kumar and I do teaching work. I am interested in studying and teaching competitive exams. My qualification is B.A., B.Ed., M.A. (Pol.Sc.), M.A. (Hindi).

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