भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की पृष्ठभूमि और विशेषताएं

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की पृष्ठभूमि

Background of Indian Independence Act 1947
ब्रिटिश संसद द्वारा पारित सन 1947 का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ब्रिटिश सरकार की सहानुभूति का परिणाम नहीं था, अपितु ब्रिटिश सरकार की विवशता की देन था।
सन 1935 के पश्चात की राष्ट्रीय गतिविधियां एवं द्वितीय महायुद्ध के कारण उत्पन्न परिस्थितियों से उत्पन्न वातावरण ने इस अधिनियम के निर्माण के लिए ब्रिटिश सरकार को विवश कर दिया।
1. राष्ट्रीय गतिविधियां – सन 1929 में कांग्रेस द्वारा पारित पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रस्ताव व तत्पश्चात 26 जनवरी 1930 से प्रतिवर्ष मनाए जाने वाले स्वतंत्रता दिवस से भारतीयों में स्वतंत्रता प्राप्त करने की उत्कट इच्छा जागृत हुई।
द्वितीय महायुद्ध के पश्चात महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए जाने वाले सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन, मुस्लिम लीग की पाकिस्तान बनाने की मांग, सुभाष चंद्र बोस द्वारा भारत के बाहर स्थापित आजाद हिंद फौज व उसकी गतिविधियां, 1946 के नौसैनिक विद्रोह आदि ने स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना को इतना तीव्र कर दिया कि ब्रिटिश सरकार द्वारा उनकी अवहेलना करना संभव नहीं रहा।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की पृष्ठभूमि और विशेषताएं
भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947

2. द्वितिय विश्व युद्ध के कारण उत्पन्न परिस्थितियां
जनता की इच्छा के विरुद्ध भारत को युद्ध में सम्मिलित कर दिया गया था। अतः उनका सहयोग प्राप्त करने की दृष्टि से एवं पाकिस्तान की मांग के कारण उत्पन्न संवैधानिक गतिरोध को दूर करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा जो प्रयास किए गए, उनमें से कुछ निम्नलिखित है –
(१) क्रिप्स प्रस्ताव – 1942 में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टेफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। क्रिप्स द्वारा सुझाए गए प्रस्तावों को क्रिप्स प्रस्ताव कहा जाता है। इस प्रस्ताव के 2 भाग थे।
पहला, वर्तमान से संबंधित प्रस्ताव व दूसरा, भविष्य से संबंधित प्रस्ताव। वर्तमान से संबंधित प्रस्ताव में युद्ध की समाप्ति तक प्रतिरक्षा का दायित्व ब्रिटिश सरकार का पर होने का प्रावधान था। भविष्य से संबंधित प्रस्ताव में औपनिवेशिक साम्राज्य प्रदान करना एवं निर्वाचित संविधान द्वारा सभा द्वारा संविधान निर्माण के प्रावधान थे।
प्रस्ताव के अत्यंत असंतोषजनक होने के कारण राजनीतिक दलों ने इसे अस्वीकार कर दिया। 11 अप्रैल 1942 को क्रिप्स प्रस्ताव वापस ले लिए गए।

(२) कैबिनेट मिशन योजना- सन 1945 में इंग्लैंड में श्रमिक दल की सरकार बनी। प्रधानमंत्री क्लिमेंट एटली के कैबिनेट के 3 सदस्य भारत भेजे गए। ब्रिटिश कैबिनेट के सदस्यों वाले इस आयोग को कैबिनेट मिशन आयोग कहा गया। आयोग ने तीन महत्वपूर्ण सुझाव दिए –
१. भारत में एक संघ राज्य की स्थापना की जाए।
२. भारत के संविधान निर्माण हेतु एक संविधान सभा का निर्माण किया जाए।
३. नए संविधान के अंतर्गत नई सरकार के गठन होने तक एक अंतरिम सरकार की स्थापना की जाए।
कांग्रेस ने कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार कर लिया। मुस्लिम लीग ने प्रत्यक्ष कार्यवाही की नीति अपनाई। परिणामस्वरूप सांप्रदायिक दंगे प्रारंभ हो गये।
3. ब्रिटिश प्रधानमंत्री की घोषणा
ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने 20 फरवरी 1947 को घोषणा की थी कि ब्रिटिश सरकार जून 1948 तक भारत की उत्तरदाई सरकार को सत्ता सौंप देगी। इस अवधि के पूर्ण हो जाने पर भारतीयों को सत्ता उसके पूर्व में भी सौंपी जा सकती है।
4. माउंटबेटन योजना – प्रधानमंत्री एटली की घोषणा के समय ही लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया। उनके प्रयास से कांग्रेस व मुस्लिम लीग के मध्य समझौता हो गया। भारत को दो अधिराज्यों में विभाजित करने की योजना को स्वीकृति के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने 15 अगस्त 1947 को भारत व पाकिस्तान को सत्ता स्थानांतरित कर दी।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की प्रमुख विशेषताएं

Salient Features of Indian Independence Act 1947
ब्रिटिश संसद द्वारा 4 जुलाई 1947 को ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम’ विधेयक प्रस्तुत किया गया और बहुत संक्षिप्त चर्चा के बाद 18 जुलाई 1947 को इसे संसद की स्वीकृति मिल गई। यह अधिनियम एक छोटा और सरल दस्तावेज था, जिसमें 20 अनुच्छेद थे। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्न प्रकार हैं –
1. दो अधिराज्यों की स्थापना
इस अधिनियम द्वारा भारत का विभाजन कर 15 अगस्त 1947 को दो स्वतंत्र अधिराज्यों (डोमिनियन स्टेटस) भारत तथा पाकिस्तान की स्थापना होगी। इन अधिराज्यों के निर्माण के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा इन्हें सत्ता स्थानांतरित कर दी जाएगी।
इसमें यह भी निश्चित किया गया कि दोनों राज्य स्वतंत्रता सत्ताधारी होंगे और ब्रिटिश सरकार इन दोनों राज्यों की संविधान सभाओं को अपने अपने देश का संविधान निर्माण करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करेगी।
2. दोनों अधिराज्यों के प्रदेशों का उल्लेख
इस अधिनियम में दोनों अधिकारियों के प्रदेशों का उल्लेख किया गया। भारत में मुंबई, मद्रास, उत्तर प्रदेश, संयुक्त प्रांत, बिहार, उड़ीसा, पूर्वी पंजाब, पश्चिम बंगाल, असम, दिल्ली, अजमेर मेरवाड़ा एवं कुर्ग के प्रदेश रखे गए और पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, उत्तर पश्चिमी प्रांत एवं असम के मुस्लिम क्षेत्र रहे।
3. दोनों के लिए अलग-अलग गवर्नर जनरल की नियुक्ति
भारत और पाकिस्तान दोनों अधिराज्यों के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा नियुक्त अलग-अलग गवर्नर जनरल होंगे। वे अपने-अपने अधिराज्य के प्रमुख होंगे। गवर्नर जनरल और प्रांतों के गवर्नर भविष्य में केवल वैधानिक शासक होंगे। उन्हें अपने प्रत्येक प्रकार के अधिकारों के संबंध में अपने मंत्रियों की सलाह द्वारा ही कार्य करना होगा।
4. नया संविधान बनाने का अधिकार
इस अधिनियम के अनुसार दोनों ही अधिराज्यों की विधानसभाओं को अपनी इच्छा अनुसार संविधान निर्माण की पूर्ण स्वतंत्रता होगी।
5. विधानसभाओं का दोहरा स्वरूप
जब तक संविधान सभाएं संविधान निर्माण नहीं कर लेंगी, तब तक वे विधानमंडल के रूप में कार्य करेगी। उन्हें कानूनी निर्माण का पूर्ण अधिकार होगा तथा ब्रिटिश संसद उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकेगी तथा 15 अगस्त 1947 के पश्चात ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किया हुआ कोई कानून उन पर लागू नहीं होगा।
6. 1935 के अधिनियम में संशोधन करने का अधिकार
जब तक दोनों अधिराज्यों की संविधान सभाएं संविधान का निर्माण नहीं कर लेती है, तब तक भारत का प्रशासन 1935 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा चलाया जाएगा, परन्तु प्रत्येक अधिराज्य को उसमें बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार संशोधन करने का अधिकार होगा।
7. ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण की समाप्ति
ब्रिटिश सरकार का 15 अगस्त 1947 के पश्चात किसी भी अधिराज्य अथवा उसके किसी प्रांत अथवा उसके किसी भाग पर कोई नियंत्रण नहीं रहेगा।
8. ब्रिटिश सम्राट के अधिकारों की समाप्ति
ब्रिटिश सम्राट के पद से भारत का सम्राट नामक पद हटा दिया गया। इंग्लैंड के सम्राट की अधिराज्यों के कानून पर निषेधाधिकार लगाने की शक्ति समाप्त कर दी गई।
9. भारत सचिव (मंत्री) के पद की समाप्ति
भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के अनुसार भारत सचिव (भारत मंत्री) का पद समाप्त कर दिया गया।
10. देशी रियासतों पर से ब्रिटिश सर्वोच्चता का अंत
अधिनियम में कहा गया कि दोनों अधिराज्यों के निर्माण के बाद ब्रिटिश सम्राट की सर्वोच्चता का अंत हो जाएगा और ब्रिटिश सरकार की देशी रियासतों के साथ जो संधियां व समझौते थे, वे भी समाप्त हो जाएंगे। वे भारत तथा पाकिस्तान में मिलने अथवा स्वतंत्र रहने के लिए मुक्त होंगी।
11. भारतीय नागरिक सेवाओं के अधिकार को कायम रखना
भारतीय नागरिक सेवक स्वतंत्रता के पश्चात भी उस सेवा पर बने रहेंगे और उनको स्वतंत्रता के पश्चात वे सब परिलाभ प्राप्त होंगे जो उनको स्वतंत्रता से पूर्व प्राप्त थे। लेकिन इस अधिनियम ने भारतीय नागरिक सेवाओं पर भारत मंत्री के सरंक्षण, नियंत्रण और नियुक्ति के अधिकार को समाप्त कर दिया।
12. अन्य – १. जब तक नए संविधान के अनुसार प्रांतों में चुनाव नहीं होते, तब तक प्रांतों में पहले से मौजूद विधानमंडल ही कार्य करते रहेंगे।
२. इस अधिनियम में दोनों अधिराज्यों को अपने अनुसार ‘ब्रिटिश राष्ट्रमंडल’ में सम्मिलित होने अथवा उससे अलग हो जाने का अधिकार दिया गया।

भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के दोष

Defects of india independence act, 1947
1. इस अधिनियम द्वारा भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, वहीं भारत का विभाजन भी हुआ। इससे भारतीय उपमहाद्वीप की राष्ट्रीय एकता विभाजित हो गई।

2. इसके बाद देशी रियासतों के एकीकरण की समस्या उत्पन्न हो गई थी।

भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 का महत्व

Importance of India Independence Act 1947
भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के महत्व का विवेचन निम्न प्रकार किया गया है –
1. भारत में अंग्रेजी सत्ता की समाप्ति
इस अधिनियम द्वारा भारत, पाकिस्तान तथा भारतीय रियासतों में अंग्रेजी सत्ता समाप्त हो गई। भारत की प्रभुसत्ता अब भारत के विधानमंडलों तथा विधानसभाओं को प्राप्त हो गई।
2. गवर्नर जनरल एक संवैधानिक प्रमुख के रूप में
यद्यपि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के द्वारा भी संक्रमण काल के लिए गवर्नर जनरल का पद बना रहा। यद्यपि उसकी नियुक्ति अभी भी ब्रिटिश सरकार द्वारा की गई थी तथापि अब वह एक संवैधानिक प्रमुख के रूप में ही था।
इस अधिनियम में यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि गवर्नर जनरल को भारतीय तथा पाकिस्तान विधानमंडलों द्वारा पारित सभी कानूनों को सहमति देनी होगी। उसकी विशेषाधिकार शक्तियां प्रभावहीन कर दी गई थी।
इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने भारतीय उपमहाद्वीप से अंग्रेजी साम्राज्यीय शासन का अंत कर दिया। अब उसके उत्तराधिकारी दो संप्रभुतासंपन्न राज्य भारत-पाकिस्तान बन गए थे।

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