सगुण भक्ति काव्य : कृष्ण काव्य

सगुण भक्ति : सगुण भक्ति काव्य को दो भागों में बांटा जा सकता है - कृष्ण काव्य और राम काव्य।

सगुण भक्ति : सगुण भक्ति काव्य को दो भागों में बांटा जा सकता है - कृष्ण काव्य और राम काव्य।

सगुण भक्ति काव्य : कृष्ण काव्य

कृष्ण काव्य : कृष्ण शब्द का अर्थ है आकर्षक। ऋग्वेद में कृष्ण नाम के एक ऋषि का वर्णन है इसके बाद ब्रह्म वैवर्ण पुराण और भागवत पुराण में कृष्ण का वर्णन मिलता है। हिंदी में कृष्ण काव्य का प्रारंभ विद्यापति से माना जाता है। कृष्ण काव्य से संबंधित कुछ संप्रदाय है -

  • निंबार्क संप्रदाय
  • राधा वल्लभ संप्रदाय
  • हरिदासी संप्रदाय
  • चैतन्य या गौड़िय संप्रदाय
  • वल्लभ संप्रदाय
वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठल दास ने अपने पिता के 84 शिष्यों में से 4 व अपने 252 में से चार शिष्यों को मिलाकर अष्टछाप की स्थापना की। ये अष्टछाप के कवि है -
  1. कुम्भलदास
  2. सूरदास
  3. परमानंद दास
  4. कृष्ण दास
  5. गोविंद स्वामी
  6. छीतस्वामी
  7. चतुर्भुज दास
  8. नंददास 
इसमें प्रथम चार कवि वल्लभाचार्य के शिष्य है। इसमें सूरदास सर्वप्रमुख है और उन्हें 'अष्टछाप का जहाज' कहा जाता है।अंतिम चार कवि विट्ठल दास के शिष्यों में से है। इसमें नंददास सर्वप्रमुख है।

जिन कवियों ने कृष्ण काव्य को एक लौकिक काव्य आंदोलन के रूप में प्रतिष्ठित किया, वे सभी वल्लभ संप्रदाय से जुड़े थे। वल्लभ संप्रदाय का दार्शनिक सिद्धांत 'शुद्धादैत' तथा साधना मार्ग 'पुष्टिमार्ग' कहलाता है। 

कुछ कृष्ण भक्त कवि संप्रदाय निरपेक्ष भी थे - जैसे मीरा, रसखान।

कृष्ण भक्ति काव्य धारा ऐसी काव्य धारा थी जिसमें सबसे अधिक कवि शामिल हुए।

भक्ति आंदोलन के कृष्ण काव्य धारा ही एकमात्र ऐसी धारा है जिसमें नारी मुक्ति का स्वर मिलता है। इनमें सबसे प्रखर स्वर मीराबाई का है। मीरा अपने समय के सामंती समाज के खिलाफ है एक क्रांतिकारी स्वर है। 

कृष्ण काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियां

1. इस काव्य में शुद्धाद्वैतवाद की अभिव्यक्ति मिलती है। शुद्धाद्वैतवाद में पुष्टिमार्ग को अपनाया गया है। पुष्टिमार्ग - भगवान के अनुग्रह को पुष्टि करते हैं। 

2. कृष्ण काव्य में अष्टयाम की भक्ति होती है।

  1. मंगल
  2. श्रृंगार 
  3. ग्वाल
  4. राजभोग
  5. उत्थापन
  6. भोग
  7. आरती 
  8. शयन 

3. कृष्ण काव्य में भक्ति के पांच स्तर स्वीकार किए गए हैं।

  1. शांत भक्त
  2. दास्य भक्ति
  3. संख्य भक्ति
  4. वात्सल्य भक्ति
  5. मधुरा भक्ति 

सूर के काव्य में वात्सल्य भक्ति तथा मीरा के काव्य में मधुर भक्ति मिलती है।

4. कृष्ण काव्य लोक रंजन का काव्य है। लोक कल्याण नहीं।

5. संपूर्ण काव्य श्रेष्ठतम गीती काव्य है। गीती काव्य - काव्य और संगीत की वर्ण संकर संतान है। 

6. कृष्ण काव्य प्रमुख रूप से मुक्त काव्य है। केवल नरोत्तम दास का सुदामा चरित काव्य प्रबंध काव्य है।

शिल्प पक्ष - भाषा - ब्रजभाषा, राजस्थानी, गुजराती, मीरा अलंकार - लगभग सभी अलंकारों का प्रयोग हुआ है।

छंद - कवित, सवैया (रसखान नरोत्तम दास) बाकी सभी में पद है। पद राग-रागिनियो के आधार पर लिखे काव्य को कहते हैं। दृष्टिकूट पद - सूर के काव्य में (साहित्य लहरी) दृष्टिकूट पद मिलते हैं अर्थात जहां अर्थ दूरारूढ़ निकले। सूर के काव्य में वाग्वैदग्धय मिलता है। विदग्धता का अर्थ है - भाव प्रेरित वचन वक्रता।

सूर के काव्य में भ्रमर-गीत सार का प्रतिपाद्य (उद्देश्य या कथन) : - सूर के काव्य 'भ्रमर-गीत सार' स्वतंत्र पुस्तक न होकर सूरसागर में ही लगभग 400 पदों का अंश है। जो सूरसागर के 10 वें स्कन्ध में मिलता है। भ्रमर-गीत सार में सूरदास ने सगुण निर्गुण का विवाद और राधा व पाती प्रसंग की कल्पनाएं की है।

भ्रमर-गीत सार का उद्देश्य है शुद्धाद्वैतवाद की अद्वैतवाद तथा योग पर विजय। भ्रमर-गीत सार अन्योक्ति काव्य है। भ्रमर-गीत अन्य कवियों द्वारा भी लिखे गए हैं। जैसे नंददास - भंवरगीत, जगन्नाथ रत्नाकर -अधव शतक, सत्यनारायण कविरत्न - भ्रमर दूत, मोहम्मद -भ्रमरागीत, चाचा हित वृंदावनवास - भ्रमर गीत। 

कृष्ण भक्त कवि और प्रमुख काव्य

सूरदास - जन्म 1478 ई में। गुरु - वल्लभाचार्य। सूरदास मथुरा और वृंदावन के बीच गऊ घाट पर रहते थे और श्रीनाथजी के मंदिर में भजन कीर्तन करते थे। सूर वात्सल्य और श्रृंगार के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनकी कविता में ब्रजभाषा का निखरा हुआ रूप है। सूरदास हिंदी साहित्य के भक्ति काव्य की कृष्ण भक्ति सगुण श्रयी शाखा के मुख्य प्रतिनिधि और सर्वश्रेष्ठ कवि है। सूरदास कृष्ण के अनन्य सखा थे। इनकी भक्ति संख्य भाव की थी।

सूरदास ने मुक्तक काव्य ही लिखे हैं तथा सभी रचनाएं गेय हैं।सूरदास की भाषा ब्रज है, उसमें माधुर्य, प्रसाद और यथास्थान ओज गुण है। सूरदास ने अलंकारों का प्रयोग नहीं किया परंतु स्वत: आ गये है।

मथुरा प्रस्थान के समय कृष्ण के अभाव में बृजवासियों की विरह-व्यथा और उद्धव-गोपी संवाद के 'भ्रमर-गीत' प्रसंग में वर्णन है।

काव्य रचना - सूरसागर, साहित्य लहरी, सूरसरावली। इसमें सूरसागर ही लोकप्रिय हुआ। साहित्य लहरी में दृष्टकूट पद है।तथा रीतिकालीन काव्य के दर्शन होते है।

अन्य रचनाएं - सूरपच्चीसी, सूररामायण, सूरसाठी, राधा रस केली।

नंददास - समय 1533 से 1583 ई.। ये तुलसीदास के चचेरे भाई थे।

रचनाएं - अनेकार्थ मंजरी, मान मंजरी, रस मंजरी, रूप मंजरी, विरह मंजरी, प्रेम बारहखड़ी, श्याम सगाई, भंवरगीत, रासपंचाध्यायी, नंददास पदावली।

रसखान - रसखान कृष्ण भक्त कवि थे। रसखान का मूल नाम सैय्यद इब्राहिम है। रसखान दिल्ली के पठान थे किंतु उनकी कविता वैष्णव भाव से सरोबार है। रसखान ने गोस्वामी विट्ठल दास से दीक्षा ली थी। भाषा ब्रज, खड़ी बोली है ।

लौकिक और अलौकिक प्रेम ही रसखान के काव्य का मूल आधार है। रसखान की भक्ति माधुर्य भाव की भक्ति है। 

रसखान स्वछंद काव्य धारा के प्रवर्तक हैं। रसखान संप्रदाय निरपेक्ष कवि है। रसखान का काव्य धाम स्तुति (वृंदावन) काव्य है।

रचनाएं - सुजान रसखान, प्रेमवाटिका, दानलीला, अष्टयाम, गोरसलीला, दानलीला (प्रबंध कृति)।

सुजान रसखान में 129 छंद है। कवित और घनाक्षरी छंदों की अधिकता हैं। 

प्रेम वाटिका - रचना दोहा छंद में हुई है। तथा रसखान की अंतिम कृति है। 

रसखान के काव्य में प्रेम, भक्ति और श्रृंगार तीनों की अजस्त्र धारा प्रवाहित है। रसखान मूलतः रसोद्रेक के कवि है। 

मीरा - जन्म - मारवाड़ (पाली) के कुड़की ग्राम में। संवत् 1555 में हुआ। पिता का नाम रत्नसिंह , विवाह- भोजराज के साथ। रचनाएं - नरसी जी को मायरो, गीत गोविंद की टीका, मीरा के पद, राग सोरठा के पद, मीरानी।

मीरा की भक्ति माधुर्य भाव की है। उसने कृष्ण को पति के रूप में स्वीकार किया है।

प्रकृति का चित्रण भी मिलता है। मीरा के पद गेय हैं। उसका काव्य गीती काव्य है। 

मीरा की भाषा व्यावहारिक है उसमें राजस्थानी ब्रज और गुजराती का मिश्रण है। माधुर्य और प्रसाद दोनों गुणों से युक्त है । परशुराम चतुर्वेदी ने मीरा के पदों को मीरा पदावली के नाम से संग्रह किया है। मीरा संप्रदाय निरपेक्ष कवि है।

My name is Mahendra Kumar and I do teaching work. I am interested in studying and teaching competitive exams. My qualification is B.A., B.Ed., M.A. (Pol.Sc.), M.A. (Hindi).

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